ग़ज़ल की दुनिया

दुश्मनी थी आज फिर यारी कहाँ से आ गई,
आपमें फिर से ये बीमारी कहाँ से आ गई.

ख़ानदानी दोस्ती थी पत्थरों से आपकी,
आईनों की फिर तरफ़दारी कहाँ से आ गई.

पूँछ वाले जानवर से नफ़रतें रखते हुए,
ये अचानक ही वफ़ादारी कहाँ से आ गई.

तुम गले भी लग गये,आँखें भी नम सी हो गयीं,
वक़्त ए रुख़सत में समझदारी कहाँ से आ गई.

फिर यक़ी भी आ ही जाएगा मगर बतलाओ तो ,
सूखे जंगल में ये चिंगारी कहाँ से आ गई

काठ की हांडी तो चढ़ती है फ़क़त इक बार ही,
फिर दुबारा आपकी बारी कहाँ से आ गई.

मुझको जीने की दुआएं दे रहे थे आपतो,
मुझमें मरने की ये तय्यारी कहाँ से आ गई.
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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ग़ज़ल ग़ज़ल की दुनिया

दोस्तों,ग़ज़ल को पढ़ने या सुनने से दिल को बड़ा सुकून मिलता है।

दोस्तों इस पोस्ट में आपको मेरी गज़लों के साथ-साथ अच्छे गजलकारों की गजलें भी पढ़ने को मिलेगी। मैं आशा करता हूं यह गजलें आपको बहुत पसंद आएंगी।

ग़ज़ल की दुनिया की शुरुआत मैं अपने एक शेर के साथ कर रहा हूं। पेश-ए-ख़िदमत है—

पीर जब दिल से निकल कर शायरी में आयेगी

एक संजीदा ग़ज़ल तहरीर में ढल जायेगी

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ग़ज़ल का अंदाज

लुटे ख़्वाबों की पनाहों में ग़ज़ल होती है,

किए वादों के गुनाहों में ग़ज़ल होती है।

मिटें जो मुल्क में चैनो-अमन लाने के लिए,

उनकी हसरत भरी आहों में ग़ज़ल होती है।

निकल पड़े जो सच की राह पर सभी के लिए,

उनकी गैरत भरी राहों में ग़ज़ल होती है।

खुशी देकर जो सभी को खुशी से झूम उठें,

उनकी पुरआब निगाहों में ग़ज़ल होती है।

वो जिन्हें इश्क़ में ख़ुदा के अक़्श जैसा दिखे,

उनकी फैली हुई बाहों में ग़ज़ल होती है।

हुक़्मराँ ने किया आवाम को तबाह जहाँ,

वहाँ हर शख़्स की आहों में ग़ज़ल होती है।

उठे आवाज़ अगर सबकी बेहतरी के लिए,

तो उसकी नेक सलाहों में ग़ज़ल होती है।

Gopal S Singh

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एक खूबसूरत ग़ज़ल — दिल का टूटा हुआ आईना रह गया

दिल का टूटा हुआ… आईना रह गया,

ख़त मुकम्मल लिखा,बस पता रह गया

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फेर कर के नजर..,रास्ते चल पडे,

वो फसाना वहीं पर थमा रह गया

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यादें दफना दीं सारी उसी घाट पर,

मेरे भीतर कहीं तू बचा रह गया

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बातें होती रहीं ….आपसे रात भर,

दर्द दिल का मगर अनकहा रह गया

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दुश्मनी थी उजालों को उस रात से,

ख्वाब आँखों में आके रुका रह गया,

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जिस्म से रूह जैसा रहा साथ जब,

बीच में कैसे ये फासला रह गया,

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है कयामत से बढ के सजा”मीरा”की,

और बाकी मेरे क्या ख़ुदा रह गया,

©कश्मीरा त्रिपाठी

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एक रूहानी ग़ज़ल——————-

कभी मेरे नज़दीक आकर तो देखो

मोहब्बत की शम्मा जलाकर तो देखो

महक जायेंगी आसमां तक हवायें

ये आँचल हवा में उड़ाकर तो देखो

न जी पाओगे चैन से एक शब भी

मुझे अपने दिल से भुलाकर तो देखो

निगाहों से मेरी नहीं बच सकोगे

कोई बात मुझसे छुपाकर तो देखो

संवर जायेगा ज़िंदगी का गुलिस्तां

किसी को भी अपना बनाकर तो देखो

न हो गर यकीं प्यार पे मेरे तुमको

बुरे वक़्त पे आज़माकर तो देखो

यक़ीनन सुकूँ चैन “राही” मिलेगा

मुझे प्यार से तुम मनाकर तो देखो

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक प्यारी ताज़ातरीन ग़ज़ल

हेलो,

ज़िन्दगी…

जिससे मिलने में हमको ज़माने लगे,

मिलते ही वो हमें आज़माने लगे ।

मुद्दतों बाद सच याद आया बहुत,

झूठ के जब ठिकाने ठिकाने लगे ।

जब भी ख़ामोशियों से मुलाकात की,

कुछ परिंदे वहाँ चहचहाने लगे ।

नींद भी उड़ गई चैन भी उड़ गया,

ख़ुद से क्या हम बहाने बनाने लगे ।

बारहा आईना देखना शौक था,

उम्र ढलते ही नज़रें चुराने लगे ।

बंद वीरान घर खोलते ही हमें,

गुज़रे पल पास अपने बुलाने लगे ।

सोचता हूँ अंधेरों में घर के शजर,

क्यौं हमें देखकर जगमगाने लगे ।

यादों ने फिर रुलाया हमें यूँ ‘असर’,

रोते-रोते ही हम मुस्कराने लगे ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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ताज़ातरीन गजल

सोच लेगा तू तो मैं तेरी रज़ा हो जाऊंगा.

मैं फकीरों की दुआ का सिलसिला हो जाऊंगा .

इक दफा कह दे कि तू है हान्सिले मंज़िल मेरी,

जिस्म से मैं रूह तक का रास्ता हो जाऊँगा.

बारगाहे इश्क की खुशबू हूँ मैं ,महसूस कर,

गर मुझे छूने कि ज़िद की तो हवा हो जाऊंगा.

जिस ग़ज़ल में तू मुसलसल बन के आयेगा रदीफ़ ,

उस गज़ल का मैं मुक्कमल काफ़िया हो जाऊंगा.

सूफ़ीयाना इश्क में है दिल फ़कीराना मेरा,

तुझमें शामिल अब किसी दिन शर्तिया हो जाऊंगा.

साँस गर लेती रही ,सांसों में मेरे बेखुदी ,

मैं फ़कीरों की मजारों का दिया हो जाऊंगा.

नूर तेरा आ रहा है मेरे चेहरे पे नज़र ,

इस से ज़्यादा अब खुदा मैं और क्या हो जाऊंगा.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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सुमन ढींगरा दुग्गल जी की कलम से—-

एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

कब कहाँ किस को दग़ा दे जानता कोई नहीं

ज़िंदगी सा बेमुरव्वत। बेवफा कोई नहीं

दिल कहीं पत्थर न हो जाए बस इतना याद रख

ये वो पत्थर है कि जिसको पूजता कोई नहीं

बेअसर हैं तेरी आहें उस पे तो हैरत न कर

पत्थरों का फूल से क्या वास्ता, कोई नहीं

भूल तो हर शख़्स से मुमकिन है हम हों आप हों

क्यूँ कि हम सब आदमी हैं देवता कोई नहीं

नफ़्सी नफ़्सी हर तरफ है कौन किस का है यहाँ

ए ख़ुदा तेरे सिवा अब आसरा कोई नहीं

बेखुदी का राज़ बतलाते हैं तुम को आज हम

हम ने उस को पा लिया जिस का पता कोई नहीं

दूर रहता है निगाहों से मेरी फिर भी ‘सुमन’

ज़हन ओ दिल में वो ही वो है दूसरा कोई नहीं

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माॅ॑

जहाॅ॑ माॅ॑ की दुआएॅ॑ हैं वहाॅ॑ डर हो नहीं सकता

ख़ुदा तो है ख़ुदा,माॅ॑ के बराबर हो नहीं सकता

नहीं मालूम हो रस्ता सफर का और मंज़िल भी

भले हो क़ाफ़ला-सालार, रहबर हो नहीं सकता

रहे ,बस रह लिये ता-उम्र यूॅ॑ ही कुछ मकानों में

मुहब्बत के बिना कोई मकाॅ॑,घर हो नहीं सकता

चलो, इस उम्र में अब आइने से दोस्ती छोड़ें

जवानी के दिनों में था जो मंज़र हो नहीं सकता

हमारी ज़िन्दगी हमको हमेशा ये सिखाती है

मिलें मजलूम की आहें,सिकंदर हो नहीं सकता

जिसे माॅ॑-बाप की अपने दुआ हासिल नहीं होती

किसी औलाद को रुतबा मयस्सर हो नहीं सकता

हवेली हो शहर में और सब सामान, सुविधाएॅ॑

मगर ये गाॅ॑व के घर के बराबर हो नहीं सकता

किशन स्वरूप

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पेश है एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————-

आग दिल में है लगी इसको बुझायें कैसे,

जिससे उम्मीद थी रूठा है मनायें कैसे।।

हम दुखी होते हैं तो रोती हैं आँखें उसकी,

ऐसे हमदर्द को बोलो तो भुलायें कैसे।।।।

ये तो सच है कि वो हमको ही चाहता है फक़त,

वो मगर दूर है फिर प्यार जतायें कैसे।।।।

बाद मुद्दत के सजाई है प्यार की महफ़िल,

ज़िद्दी तूफ़ान में अब शम्मा जलायें कैसे।।

एक अर्से से हमें नींद नहीं आई है,

कोई बतलाये उसे ख़्वाब में लायें कैसे।

है नदी पार की बस्ती में बसेरा उसका,

कोई जरिया नहीं जाने का तो जायें कैसे।

अब उसे हम पे भरोसा ही नहीं है “राही”

उससे अब दिल की कोई बात बतायें कैसे।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक संज़ीदा ग़ज़ल

आज दरिया चली ख़ुद लहर ढूढ़ने,

तल्खियों में बसा खुश शहर ढूढ़ने।

आज आबो – हवा है निराली बहुत,

जिन्दगी जब चली खुद ज़हर ढूढ़ने।

सब मसीहा अमन के बने फिर रहे,

है चला जब अमन ख़ुद बशर ढूढने।

ख़्वाब पाले, बढ़े तिस्नग़ी से सजे,

रूह को दे सुकूँ वो दहर ढूढ़ने।

दौर है बे-अदब शानो-शौक़त का ये,

सादगी में चले सब कहर ढूढ़ने।

आदमी,आदमी के गले मिल रहा,

“अपने काटे का ज़िन्दा असर”ढूढ़ने।

तोड़ती साँस अब सादगी कह रही,

दफ़्न हो मैं चली खुश-ज़िगर ढूढ़ने।

Gopal S Singh

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ग़ज़ल

जब उठी आवाज मुफ़्लिश की वो दबवाई गयी ।

हर दफा झूठी फ़क़त तस्बीर दिखलाई गयी ।

मुश्किलें आसान हैं दौलत के दम पर इस कदर

जेब है भारी उसे हर चीज दिलवायी गयी ।

पिस रही है अब गरीबी कुछ सियाशी पाट में

मज़हबी, क़ौमी सवालों में ये उलझाई गयी।

एक चिनगारी जो भड़की आग बढ़ती ही गयी

हुक्मरानों तक बजा फ़रियाद पहुँचाई गयी।

सूरतें बदलें ‘सुमित’ तब तो बने कुछ बात भी

अब तलक वादों की बस आवाज सुनवाई गयी।

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित’

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

जनाज़ा किसी का उठा ही नहीं है,

मरा कौन मुझमें पता ही नहीं है.

मुझे खो दिया और लगा उसको ऐसा,

कि जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं है.

ये कैसी इबादत ये कैसी नमाज़ें,

ज़ुबां पर किसी के दुआ ही नहीं है.

चले जिस्म से रूह तक तो लगा ये,

बिछुड़ वो गया जो मिला ही नहीं है.

यूँ कहने को हम घर से चल तो दिए हैं,

मगर जिस तरफ़ रास्ता ही नहीं है.

ख़ताओं की वो भी सज़ा दे रहे हैं,

गुनाहों के जिनकी सज़ा ही नहीं है.

पसीने से मैं अपने वो लिख रहा हूँ,

जो क़िस्मत में मेरे लिखा ही नहीं है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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मनोज राठोर ‘मनुज’ जी की कलम से…..

कह दो वफ़ा कुबूल है क्यों कश्मकश में हो

बाकी तो सब फिजूल है क्यों कश्मकश में हो

जिस पर तुम्हें गुरुर तुम्हारा बदन नहीं

यह तो जमीं की धूल है क्यों कशमकश में हो

मिलता उसे ही कुछ है जो खोता है कुछ यहां

जग का यही उसूल है क्यों कशमकश में हो

उजड़े हुए चमन से जो खुशबू सी आ रही

जिंदा कोई तो फूल है क्यों कशमकश में हो

दे दो सजा या छोड़ दो उल्फ़त तो की मनुज

इतनी सी अपनी भूल है क्यों कशमकश में हो

मनोज राठौर मनुज

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल आपके हवाले———

ख़ुद किसी की याद में दिल को जलाकर देखिये,

और फिर उसके लिये जग को भुलाकर देखिये।

पुरसुकूं दिल को मिलेगा काम ये जो कर दिये,

रो रहा बच्चा कोई उसको हँसाकर देखिये।।।

उनकी शोहबत में मिलेगी आप को शोहरत ज़रूर,

बस किसी महफ़िल में उनको तो बुलाकर देखिये।

राह-ए-उल्फ़त में फक़त गुल ही नहीं काँटे भी हैं,

आज़माना हो,किसी से दिल लगाकर देखिये।।

आप को भी चाहने वाले मिलेंगे बेशुमार,

बस किसी के दर्द में आँसू बहाकर देखिये।

दूर रहकर दिलरुबा से चैन किसको है मिला,

है नहीं गर चे यकीं बस आज़माकर देखिये।

प्यार करने का अगर करते हैं दावा आप तो,

लाख मुश्किल हो तो क्या फिर भी निभाकर देखिये।

आप का ही तज़किरा होगा शहर में तरफ़,

इक किसी मज़लूम को अपना बनाकर देखिये।

उम्र भर “राही” दवावों से रहेंगे दूर आप,

सादगी से ज़िन्दगी अपनी बिताकर देखिये।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————

ये दुनिया मुझे आज़माने लगी है,

बुलंदी से नीचे गिराने लगी है।

कभी टूट कर प्यार मुझसे किया था,

मगर क्यों वो अब दूर जाने लगी है।।

खुले दिल से मिलते रहे थे मगर, वो,

कई राज़ दिल के छुपाने लगी है।।।।

नहीं देख पाती थी जो मेरे आँसू,

वो हर पल मुझे अब रुलाने लगी है।

लिपट कर जो साये से रहती थी हरदम,

वो मिलने से नज़रें चुराने लगी है।।

जिसे तीरगी रास आती नहीं थी,

चराग़ों को क्यों अब बुझाने लगी है।

बहुत साफ थे पैरहन जिसके “राही”

वो दामन में काँटे उगाने लगी है।।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414 ।

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एक नई ग़ज़ल सूफी सुरेश चतुर्वेदी जी

की कलम से

मेरी गहराई में बन कर समंदर झांकता है,

न जाने कौन है जो मेरे अन्दर झांकता है.

ख़ुद अपने आप से डर कर सिमट जाता है ख़ुद में,

किसी भी आईने में जब भी पत्थर झांकता है.

बदन में कर्बला बन कर कोई लेता है साँसें ,

लहू में जब कहीं भी प्यासा ख़जर झांकता है.

रहा करते हैं दोनों साथ और दोनों हैं ख़ाली,

यही बस सोच कर मुझमें मेरा घर झांकता है.

मुझे बचपन से माँ कहती रही है जाने क्यूँ ये ,

मेरी ऐडी से से इक छोटा सा नश्तर झांकता है.[नश्तर=कांटा]

मेरे दिल में यक़ीनन ही है रोशनदान कोई,

किसी की याद का जिससे कबूतर झांकता है.

उसे दिखतीं हैं चारों ही तरफ़ लाशें ही लाशें ,

कभी ख़ुद में ही जब कोई सितमगर झांकता है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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पेश है एक और ताज़ातरीन ग़ज़ल———

आये जो आप घर मेरे मौसम बदल गया,

यह देख दुश्मनों का जनाजा निकल गया।

जो शक़ की निगाहों से मुझे देखते रहे,

उनको मेरे ही सामने कोई कुचल गया।

ग़ैरों की ख़ुशी देख के सदमें में जो रहा,

बेवक़्त मर के आख़िरस दुनिया से कल गया।

शोहरत भी उसके हाथ में आकर चली गई,

हाथी किसी ढलान से गोया फिसल गया।

सूरज भी था शबाब पर जलता रहा बदन,

ऐसी लगी वो आग नगर सारा जल गया।

उस ज़लज़ले के बाद का मंज़र तो देखिये,

सहरा जो जल रहा था कल दरिया में ढल गया।

चाहा न जिसको प्यार से मैंने कभी ” राही ”

उस नाज़नीं को देख के दिल क्यों फिसल गया।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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मेरी कलम से एक ग़ज़ल जिंदगी की…….

खुशी के बुलबुले हैं कुछ, गमों का बोलबाला है

हँसी के हौसलों ने आज तक हमको सम्हाला है

कई उम्मीद के बादल यहाँ छा कर नहीं बरसे

जमीं सब आस की प्यासी पड़ा सूखे से पाला है

बहुत मजबूर है ईमान अब सुनता नहीं कोई

खड़ा है सच सरे महफ़िल मगर होठो पे ताला है

नहीं कोई बचा अबतक खुदा की उस अदालत से

खरा इंसाफ है उसका तरीका भी निराला है

करम के साथ ही अंजाम है नेकी बदी का भी

इसी दिल मे खुदा का घर यही मंदिर शिवाला है

हरिशंकर पाण्डेय

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पेश है एक नाज़ुक ग़ज़ल—

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सुनो आज वादा निभाने का दिन है,

नई शाख पे गुल खिलाने का दिन है।

शब-ए-वस्ल में यूँ न शर्माओ जानम,

ये दिल खोलकर गुदगुदाने का दिन है।

जवां जोश में पाँव फिसले हों शायद,

उसे आज अब भूल जाने का दिन है।

जो ग़ज़लें क़िताबों में हैं क़ैद अब तक,

उन्है बज़्म में गुनगुनाने का दिन है।।

मोहब्बत के गौहर जो पाये हैं हमने,

उन्हें अपने दिल में छुपाने का दिन है।

मुकम्मल है कितनी मोहब्बत ये अपनी,

इसे आज ही आज़माने का दिन है।।

जहाँ तुम मिले थे डगर में अकेले,

वहीं”राही”घर इक बनाने का दिन है।

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078,9893502414

💐💐💐💐💐ग़ज़ल💐💐💐💐💐

गीत के सुर को सजा दे , साज ऐसा चाहिए

दिल तलक पहुँचे सदा अल्फ़ाज़ ऐसा चाहिए

कुछ छिपायें कुछ बतायें, फितरतें इंसान की

जब खुले खुशियाँ बिखेरे , “राज ” ऐसा चाहिए

राह खुद अपनी बनाये फिर सजाकर मंज़िलें

रुख हवा का मोड़ दे ‘अंदाज़’ ऐसा चाहिए

जीत ले हर एक बाज़ी हौसले के जोर से

नाज़ हो अंजाम को, “आगाज़” ऐसा चाहिए

जो हटे पीछे कभी ना, जंग में डटकर लड़े

वीरता भी हो फिदा , “ज़ांबाज ” ऐसा चाहिए

हरिशंकर पाण्डेय

**************ग़ज़ल*************

गम के साये से घिरे दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी हर वफा का मैं सिला न दे पाया

मेरे ही दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !!

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे बैठे हैं,

छलक जायें न कहीं , सामने आऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल भी नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!!

मैंने सोचा था, बहुत दूर चला जाऊँ पर,

तुम न भूलोगी मुझे, मै भी भूलाऊँ कैसे!!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल——

“”””””””””””””””””””””””

ये चिलमन में चेहरा छुपाओ न ऐसे,

मिरे दिल की धड़कन बढ़ाओ न ऐसे।

तुम्हें भर नज़र देखना चाहता हूँ,

नज़र फेरकर अब सताओ न ऐसे।

यही मेरी चाहत है दिल में रहो तुम,

किसी और से दिल लगाओ न ऐसे।

जो उल्फ़त के दीपक जलाये थे मैंने,

हवा दे के उसको बुझाओ न ऐसे।।

सफ़र है कठिन दूर मंज़िल है अपनी,

सरे राह काँटे। बिछाओ न ऐसे।।

बहुत आज़माया है लोगों ने मुझको,

मुझे और तुम आज़माओ न ऐसे।।

मोहब्बत अगर तुमको मुझसे है “राही”

तो बाहें झटक करके जाओ न ऐसे।।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक ग़ज़ल

“ये ज़मीं और आस्माँ हूँ मैं,

बेख़बर हूँ मगर कहाँ हूँ मैं ।

जिनमें हर सू उजाले रहते हैं,

उन अँधेरों का कारवाँ हूँ मैं ।

जिसमें कुछ वक़्त ही फ़क़त ठहरा,

भूला-बिसरा वो आशियाँ हूँ मैं ।

मुझसे क्यों दूर-दूर रहती है,

ज़िन्दगी तेरी दास्ताँ हूँ मैं ।

वक़्त से चोट खाए ज़ख़्मों का,

मुस्कराता हुआ निशाँ हूँ gb मैं ।

इक जगह होता गर बता देता,

कौन जाने कहाँ-कहाँ हूँ मैं ।

ज़ीस्त की क़ैद में ‘असर’ सिमटा,

सिर्फ़ उठता हुआ धुआँ हूँ मैं ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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नई गज़ल

यही सवाल अब …. उलझा, मेरे फसाने मे l

कम थी उल्फत..क्या मेरे दिल के आशियाने में !

गर खता थी कुछ हमारी तो बस बता देते ,

हम तो माहिर हैं, किसी भी तरह मनाने में ..!

उनकी यादें भी वफादार हैं , बसी दिल में,

कौन कहता है , वफ़ा है नहीं ज़माने में !

अब तो तूफान का भी खौफ नहीं है मुझको ,

दिये बुझा कर मैं बैठा गरीबखाने में ….

तुम्हारी रूठने की यह अदा बड़ी कातिल,

क्या मिलेगा तुम्हे ऐसे हमें सताने में ..

मगर यकीन है, दावा है, अपनी चाहत पर,

तुम्हारे हाँथ बढेंगे , दिये जलाने में ….

हरिशंकर पाण्डेय

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नई ग़ज़ल

मिलेगा मर्तबा , हस्ती को बचाये रखना !

सफर के वास्ते, कश्ती को सजाये रखना !

कहीं तूफाँ तुम्हारा रास्ता क्या रोकेगा ,

अपनी यारी यूँ समुन्दर से बनाये रखना !

जतन से ध्यान से रिश्तों को सम्हाले रखना,

गुलों से प्यार के गुलशन को सजाये रखना!

बड़ी है अहमियत , किरदार की यकीं मानो,

बड़ा अजीज है , हर वक़्त निभाये रखना !

हुनर सफर में बुलंदी तलाश ले फिर भी ,

रहे गरूर ना नजरों को झुकाये रखना !

भले हो सामना हर बार इम्तिहाँ से सुनो ,

अपनी तालीम को जेहन में बसाये रखना !

वतन की मिट्टी के अनमोल नगीने बनकर ,

इसकी तहजीब और शोहरत को उठाये रखना !

हरिशंकर पाण्डेय

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ग़ज़ल संग्रह “चले भी आओ”से एक ग़ज़ल—

“””””””””””””””””””””””””””””””

तुम्हारा शर्म से नज़रें झुकाना याद है हमको,

वो दिलकश प्यार के नग़में सुनाना याद है हमको।

तुम्हारी जिन अदाओं ने हमें शायर बनाया है,

मुसल्सल हर अदा वो क़ातिलाना याद है हमको।

कली से फूल बनकर तुमने जब अंगड़ाइयाँ ली थी,

घटा में बिजलियों का कौंध जाना याद है हमको।

झलक पाकर तुम्हारी खिल उठे जब फूल सहरा में,

परिंदों का मिलन के गीत गाना याद है हमको।।।

तुम्हारा ज़ुल्फ़ लहराना वो दिन में रात हो जाना,

सितारों का फ़लक़ पे झिलमिलाना याद है हमको।

मज़ा आया तुम्हारे गेसुओं से जब हुई बारिश,

उन्हीं रिमझिम फुहारों में नहाना याद है हमको।

खिला चेहरा तुम्हारा देखकर उस चाँद का “राही”

दुबक कर बादलों में मुँह छुपाना याद है हमको।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078, 9893502414

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**ग़ज़ल**

गम के साये से घिरे, दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी ही वफा वाजिब , कसूर मेरा था ,

अपने इस दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे हैं जाकर ,

छलक जायें न कहीं , सामने जाऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल यूँ ,नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

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—————- एक ग़ज़ल————

दफ़अतन दर्द-ए-जिगर कोई बढ़ाकर चल दिया,

बिन धुआँ बिन आग के तनमन जलाकर चल दिया।

कुछ ग़लत करते जो चारागर को पकड़ी भीड़ ने,

शर्म से वो कुछ न बोला सर झुकाकर चल दिया।

मुल्क के नामी अदीबों से सजी उस बज़्म में,

एक बच्चा आईना सबको दिखाकर चल दिया।

वो फ़रिश्ता, रौशनी जिसने न देखी थी कभी,

जाते-जाते नूर की दौलत लुटाकर चल दिया।

मैंने इक शम्मा जलाई थी अमन के वास्ते,

अम्न का दुश्मन कोई आया बुझाकर चल दिया।

है जो जन्नत सरज़मीं का वादी-ए-कश्मीर है,

कौन उसमें आग नफ़रत की लगाकर चल दिया।

जब भरी हुंकार “राही” भारती के लाल ने,

जानी दुश्मन सरहदों से तिलमिलाकर चल दिया।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078,9893502414

***********************************”

फासला दरमियाँ रखा ही नहीं,

यार फिर भी हमें मिला ही नहीं.

एक बच्चा है मुझमें ऐसा भी,

उम्र भर जो कभी हंसा ही नहीं.

इन दरख्तों के झुलसे जिस्मों पर,

अबके मौसम ने कुछ लिखा ही नहीं.

प्यासे कूए ने नेकियों से कहा,

नेकियों का सिला मिला ही नहीं.

मेरी ग़ज़लें तो माँ के जैसी हैं,

जिनके होठों पे बददुआ ही नहीं.

एक लम्हा भी चैन से न कटा,

उम्र कैसे कटी पता ही नहीं.

उस से बिछड़ा नहीं घड़ी भर भी ,

उम्र भर जो मेरा हुआ ही नहीं.

उसकी ग़ज़लों का ऐसा शेर हूँ मैं,

जो मुक्कमल कभी हुआ ही नहीं.

मुक़म्मल =पूरा

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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—-ग़ज़ल—

मुझे ज़िंदगी रास आई न तुम बिन,

गुलों की ये ख़ुशबू भी भाई न तुम बिन।

धरा तप रही थी बदन जल रहा था,

ये सावन की रिमझिम सुहाई न तुम बिन।

कई साल गुज़रे हैं तन्हाईयों में,

कभी कोई महफ़िल सजाई न तुम बिन।

कमाई की राहें बहुत थीं नज़र में,

मगर कोई जोखिम उठाई न तुम बिन।

जगाई थी जो रूह में प्यास तुमने,

किसी ने भी उसको बुझाई न तुम बिन।

किसी ने भी मंदिर का खोला न ताला,

किसी ने भी शम्मा जलाई न तुम बिन।

बहुत हैं यहाँ चाहने वाले “राही”,

किसी को मेरी याद आई न तुम बिन।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक नज़्म ( कविता )

☆कहर इक तूफान का, कैसी तबाही दे गया☆

कहर इक तूफान का, कैसी “तबाही” दे गया I

आशियाना हर “परिन्दे” का उड़ा कर ले गया

जड़ से उखड़े कुछ दरख्तों का मिटा नामोनिशां ,

अब फिज़ा वीरान लगती , दर्द कैसा दे गया !

काल की आँधी थी वो उसने किया बर्बाद सब,

मौत का तांडव मचाकर पीर भारी दे गया।

जिनके अपने थे गए अब लौटना मुमकिन नहीं,

अश्क़ का सैलाब देकर सारी खुशियाँ ले गया।

अब तो कलियों और फूलों की महक फीकी हुई ,

सब तितलियों में उदाशी, जोश गुलशन से गया !

इक हवा के तेज झोंके से सहम जाते हैं अब,

खूब ज़ालिम था वो तूफां, खौफ दिल में दे गया !

सरजमी पर लौट आये सब कहाँ रुकते भला

अब परिन्दों को बनाना है नया इक आशियाँ !

हरिशंकर पाण्डेय-हरिशंकर-9967690881

hppandey59@gmail.com

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एक ताज़ा ग़ज़ल——————-

आज़माना चाहते हो आज़माकर देख लो,

मैं संभलता ही रहूँगा तुम गिराकर देख लो।

मैं तसव्वुर से तुम्हारे जा न पाउँगा कभी,

कोशिशें कर लो मुसल्सल औ भुलाकर देख लो।

टूट जाऊँ मैं ज़रा सी बात पर मुम्किन नही,

हो यकीं तुमको न,घर मेरा जलाकर देख लो।

पायलें छम छम करेंगी जब पढूँगा मैं ग़ज़ल,

चाँदनी शब में सनम महफ़िल सजाकर देख लो।

तुम अकेले रह न पाओगे ये दावा है मेरा,

कुछ दिनों को घर अलग अपना बसाकर देख लो।

चाँद धरती पर उतर आयेगा काली रात में,

तुम ज़रा चेहरे से ये चिलमन हटाकर देख लो।

आग लग जायेगी पानी में है “राही” को यकीं,

आज बेपर्दा नदी में तुम नहा कर देख लो।।

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प्यार करोगे प्यार मिलेगा,

अपनों का संसार मिलेगा ।

दिल से फ़र्ज़ निभाओगे जब,

जो चाहो अधिकार मिलेगा।।

जब अवाम का काम करोगे,

फूलों का तब हार मिलेगा।।

सोच लूट की छोड़ो वार्ना,

हर रस्ते पर खार मिलेगा।

चाल ढाल बदलो ख़ुद अपनी,

तभी तुम्हें दिलदार मिलेगा।।

जिसे खोजते हो बरसों से,

वो दरिया के पार मिलेगा।

महफ़िल तभी सजेगी “राही”

जब कोई फ़नकार मिलेगा।

“राही” भोजपुरी , जबलपुर मध्य प्रदेश ।

07987949078, 09893502414

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एक ग़ज़ल श्री अनिल कुमार राही की कलम से

ज़रा-सी बात पर हो तुम ख़फा अच्छा नहीं लगता।

जुदा होकर रहे फिर गमज़दा अच्छा नहीं लगता।।

बहारें चूमती दामन न जाओ छोड़कर मुझको।

तुम्हारे बिन कोई मौसम जरा अच्छा नहीं लगता।।

हुए मशहूर हम इतने ज़माने की नज़र हम पर।

तुम्हे कोई कहे अब बेवफा अच्छा नहीं लगता।।

खुदाया रूठ जाये तो कसम रब की करूँ सजदा।

जुनूने इश़क में ये आसरा अच्छा नहीं लगता।।

मुहब्बत पर भरोसा कर लिए हैं आँख में आँसू।

बगावत का सलीका यूँ डरा अच्छा नहीं लगता।।

जुड़ी है हर खुशी तुमसे हकीक़त यह खुदा जाने।

नुमाॅया हो वफ़ा यह फलसफा अच्छा नहीं लगता।।

तुम्हारा साथ था राही खुदाई साथ थी अपने।

मगर अब प्यार का वो तज़किरा अच्छा नहीं लगता।।

(अनिल कुमार राही)की दुनिया

दोस्तों,ग़ज़ल को पढ़ने या सुनने से दिल को बड़ा सुकून मिलता है।

दोस्तों इस पोस्ट में आपको मेरी गज़लों के साथ-साथ अच्छे गजलकारों की गजलें भी पढ़ने को मिलेगी। मैं आशा करता हूं यह गजलें आपको बहुत पसंद आएंगी।

ग़ज़ल की दुनिया की शुरुआत मैं अपने एक शेर के साथ कर रहा हूं। पेश-ए-ख़िदमत है—

पीर जब दिल से निकल कर शायरी में आयेगी

एक संजीदा ग़ज़ल तहरीर में ढल जायेगी

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ग़ज़ल का अंदाज

लुटे ख़्वाबों की पनाहों में ग़ज़ल होती है,

किए वादों के गुनाहों में ग़ज़ल होती है।

मिटें जो मुल्क में चैनो-अमन लाने के लिए,

उनकी हसरत भरी आहों में ग़ज़ल होती है।

निकल पड़े जो सच की राह पर सभी के लिए,

उनकी गैरत भरी राहों में ग़ज़ल होती है।

खुशी देकर जो सभी को खुशी से झूम उठें,

उनकी पुरआब निगाहों में ग़ज़ल होती है।

वो जिन्हें इश्क़ में ख़ुदा के अक़्श जैसा दिखे,

उनकी फैली हुई बाहों में ग़ज़ल होती है।

हुक़्मराँ ने किया आवाम को तबाह जहाँ,

वहाँ हर शख़्स की आहों में ग़ज़ल होती है।

उठे आवाज़ अगर सबकी बेहतरी के लिए,

तो उसकी नेक सलाहों में ग़ज़ल होती है।

Gopal S Singh

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एक खूबसूरत ग़ज़ल — दिल का टूटा हुआ आईना रह गया

दिल का टूटा हुआ… आईना रह गया,

ख़त मुकम्मल लिखा,बस पता रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

फेर कर के नजर..,रास्ते चल पडे,

वो फसाना वहीं पर थमा रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

यादें दफना दीं सारी उसी घाट पर,

मेरे भीतर कहीं तू बचा रह गया

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बातें होती रहीं ….आपसे रात भर,

दर्द दिल का मगर अनकहा रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

दुश्मनी थी उजालों को उस रात से,

ख्वाब आँखों में आके रुका रह गया,

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

जिस्म से रूह जैसा रहा साथ जब,

बीच में कैसे ये फासला रह गया,

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

है कयामत से बढ के सजा”मीरा”की,

और बाकी मेरे क्या ख़ुदा रह गया,

©कश्मीरा त्रिपाठी

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एक रूहानी ग़ज़ल——————-

कभी मेरे नज़दीक आकर तो देखो

मोहब्बत की शम्मा जलाकर तो देखो

महक जायेंगी आसमां तक हवायें

ये आँचल हवा में उड़ाकर तो देखो

न जी पाओगे चैन से एक शब भी

मुझे अपने दिल से भुलाकर तो देखो

निगाहों से मेरी नहीं बच सकोगे

कोई बात मुझसे छुपाकर तो देखो

संवर जायेगा ज़िंदगी का गुलिस्तां

किसी को भी अपना बनाकर तो देखो

न हो गर यकीं प्यार पे मेरे तुमको

बुरे वक़्त पे आज़माकर तो देखो

यक़ीनन सुकूँ चैन “राही” मिलेगा

मुझे प्यार से तुम मनाकर तो देखो

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक प्यारी ताज़ातरीन ग़ज़ल

हेलो,

ज़िन्दगी…

जिससे मिलने में हमको ज़माने लगे,

मिलते ही वो हमें आज़माने लगे ।

मुद्दतों बाद सच याद आया बहुत,

झूठ के जब ठिकाने ठिकाने लगे ।

जब भी ख़ामोशियों से मुलाकात की,

कुछ परिंदे वहाँ चहचहाने लगे ।

नींद भी उड़ गई चैन भी उड़ गया,

ख़ुद से क्या हम बहाने बनाने लगे ।

बारहा आईना देखना शौक था,

उम्र ढलते ही नज़रें चुराने लगे ।

बंद वीरान घर खोलते ही हमें,

गुज़रे पल पास अपने बुलाने लगे ।

सोचता हूँ अंधेरों में घर के शजर,

क्यौं हमें देखकर जगमगाने लगे ।

यादों ने फिर रुलाया हमें यूँ ‘असर’,

रोते-रोते ही हम मुस्कराने लगे ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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ताज़ातरीन गजल

सोच लेगा तू तो मैं तेरी रज़ा हो जाऊंगा.

मैं फकीरों की दुआ का सिलसिला हो जाऊंगा .

इक दफा कह दे कि तू है हान्सिले मंज़िल मेरी,

जिस्म से मैं रूह तक का रास्ता हो जाऊँगा.

बारगाहे इश्क की खुशबू हूँ मैं ,महसूस कर,

गर मुझे छूने कि ज़िद की तो हवा हो जाऊंगा.

जिस ग़ज़ल में तू मुसलसल बन के आयेगा रदीफ़ ,

उस गज़ल का मैं मुक्कमल काफ़िया हो जाऊंगा.

सूफ़ीयाना इश्क में है दिल फ़कीराना मेरा,

तुझमें शामिल अब किसी दिन शर्तिया हो जाऊंगा.

साँस गर लेती रही ,सांसों में मेरे बेखुदी ,

मैं फ़कीरों की मजारों का दिया हो जाऊंगा.

नूर तेरा आ रहा है मेरे चेहरे पे नज़र ,

इस से ज़्यादा अब खुदा मैं और क्या हो जाऊंगा.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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सुमन ढींगरा दुग्गल जी की कलम से—-

एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

कब कहाँ किस को दग़ा दे जानता कोई नहीं

ज़िंदगी सा बेमुरव्वत। बेवफा कोई नहीं

दिल कहीं पत्थर न हो जाए बस इतना याद रख

ये वो पत्थर है कि जिसको पूजता कोई नहीं

बेअसर हैं तेरी आहें उस पे तो हैरत न कर

पत्थरों का फूल से क्या वास्ता, कोई नहीं

भूल तो हर शख़्स से मुमकिन है हम हों आप हों

क्यूँ कि हम सब आदमी हैं देवता कोई नहीं

नफ़्सी नफ़्सी हर तरफ है कौन किस का है यहाँ

ए ख़ुदा तेरे सिवा अब आसरा कोई नहीं

बेखुदी का राज़ बतलाते हैं तुम को आज हम

हम ने उस को पा लिया जिस का पता कोई नहीं

दूर रहता है निगाहों से मेरी फिर भी ‘सुमन’

ज़हन ओ दिल में वो ही वो है दूसरा कोई नहीं

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माॅ॑

जहाॅ॑ माॅ॑ की दुआएॅ॑ हैं वहाॅ॑ डर हो नहीं सकता

ख़ुदा तो है ख़ुदा,माॅ॑ के बराबर हो नहीं सकता

नहीं मालूम हो रस्ता सफर का और मंज़िल भी

भले हो क़ाफ़ला-सालार, रहबर हो नहीं सकता

रहे ,बस रह लिये ता-उम्र यूॅ॑ ही कुछ मकानों में

मुहब्बत के बिना कोई मकाॅ॑,घर हो नहीं सकता

चलो, इस उम्र में अब आइने से दोस्ती छोड़ें

जवानी के दिनों में था जो मंज़र हो नहीं सकता

हमारी ज़िन्दगी हमको हमेशा ये सिखाती है

मिलें मजलूम की आहें,सिकंदर हो नहीं सकता

जिसे माॅ॑-बाप की अपने दुआ हासिल नहीं होती

किसी औलाद को रुतबा मयस्सर हो नहीं सकता

हवेली हो शहर में और सब सामान, सुविधाएॅ॑

मगर ये गाॅ॑व के घर के बराबर हो नहीं सकता

किशन स्वरूप

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पेश है एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————-

आग दिल में है लगी इसको बुझायें कैसे,

जिससे उम्मीद थी रूठा है मनायें कैसे।।

हम दुखी होते हैं तो रोती हैं आँखें उसकी,

ऐसे हमदर्द को बोलो तो भुलायें कैसे।।।।

ये तो सच है कि वो हमको ही चाहता है फक़त,

वो मगर दूर है फिर प्यार जतायें कैसे।।।।

बाद मुद्दत के सजाई है प्यार की महफ़िल,

ज़िद्दी तूफ़ान में अब शम्मा जलायें कैसे।।

एक अर्से से हमें नींद नहीं आई है,

कोई बतलाये उसे ख़्वाब में लायें कैसे।

है नदी पार की बस्ती में बसेरा उसका,

कोई जरिया नहीं जाने का तो जायें कैसे।

अब उसे हम पे भरोसा ही नहीं है “राही”

उससे अब दिल की कोई बात बतायें कैसे।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक संज़ीदा ग़ज़ल

आज दरिया चली ख़ुद लहर ढूढ़ने,

तल्खियों में बसा खुश शहर ढूढ़ने।

आज आबो – हवा है निराली बहुत,

जिन्दगी जब चली खुद ज़हर ढूढ़ने।

सब मसीहा अमन के बने फिर रहे,

है चला जब अमन ख़ुद बशर ढूढने।

ख़्वाब पाले, बढ़े तिस्नग़ी से सजे,

रूह को दे सुकूँ वो दहर ढूढ़ने।

दौर है बे-अदब शानो-शौक़त का ये,

सादगी में चले सब कहर ढूढ़ने।

आदमी,आदमी के गले मिल रहा,

“अपने काटे का ज़िन्दा असर”ढूढ़ने।

तोड़ती साँस अब सादगी कह रही,

दफ़्न हो मैं चली खुश-ज़िगर ढूढ़ने।

Gopal S Singh

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ग़ज़ल

जब उठी आवाज मुफ़्लिश की वो दबवाई गयी ।

हर दफा झूठी फ़क़त तस्बीर दिखलाई गयी ।

मुश्किलें आसान हैं दौलत के दम पर इस कदर

जेब है भारी उसे हर चीज दिलवायी गयी ।

पिस रही है अब गरीबी कुछ सियाशी पाट में

मज़हबी, क़ौमी सवालों में ये उलझाई गयी।

एक चिनगारी जो भड़की आग बढ़ती ही गयी

हुक्मरानों तक बजा फ़रियाद पहुँचाई गयी।

सूरतें बदलें ‘सुमित’ तब तो बने कुछ बात भी

अब तलक वादों की बस आवाज सुनवाई गयी।

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित’

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

जनाज़ा किसी का उठा ही नहीं है,

मरा कौन मुझमें पता ही नहीं है.

मुझे खो दिया और लगा उसको ऐसा,

कि जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं है.

ये कैसी इबादत ये कैसी नमाज़ें,

ज़ुबां पर किसी के दुआ ही नहीं है.

चले जिस्म से रूह तक तो लगा ये,

बिछुड़ वो गया जो मिला ही नहीं है.

यूँ कहने को हम घर से चल तो दिए हैं,

मगर जिस तरफ़ रास्ता ही नहीं है.

ख़ताओं की वो भी सज़ा दे रहे हैं,

गुनाहों के जिनकी सज़ा ही नहीं है.

पसीने से मैं अपने वो लिख रहा हूँ,

जो क़िस्मत में मेरे लिखा ही नहीं है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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मनोज राठोर ‘मनुज’ जी की कलम से…..

कह दो वफ़ा कुबूल है क्यों कश्मकश में हो

बाकी तो सब फिजूल है क्यों कश्मकश में हो

जिस पर तुम्हें गुरुर तुम्हारा बदन नहीं

यह तो जमीं की धूल है क्यों कशमकश में हो

मिलता उसे ही कुछ है जो खोता है कुछ यहां

जग का यही उसूल है क्यों कशमकश में हो

उजड़े हुए चमन से जो खुशबू सी आ रही

जिंदा कोई तो फूल है क्यों कशमकश में हो

दे दो सजा या छोड़ दो उल्फ़त तो की मनुज

इतनी सी अपनी भूल है क्यों कशमकश में हो

मनोज राठौर मनुज

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल आपके हवाले———

ख़ुद किसी की याद में दिल को जलाकर देखिये,

और फिर उसके लिये जग को भुलाकर देखिये।

पुरसुकूं दिल को मिलेगा काम ये जो कर दिये,

रो रहा बच्चा कोई उसको हँसाकर देखिये।।।

उनकी शोहबत में मिलेगी आप को शोहरत ज़रूर,

बस किसी महफ़िल में उनको तो बुलाकर देखिये।

राह-ए-उल्फ़त में फक़त गुल ही नहीं काँटे भी हैं,

आज़माना हो,किसी से दिल लगाकर देखिये।।

आप को भी चाहने वाले मिलेंगे बेशुमार,

बस किसी के दर्द में आँसू बहाकर देखिये।

दूर रहकर दिलरुबा से चैन किसको है मिला,

है नहीं गर चे यकीं बस आज़माकर देखिये।

प्यार करने का अगर करते हैं दावा आप तो,

लाख मुश्किल हो तो क्या फिर भी निभाकर देखिये।

आप का ही तज़किरा होगा शहर में तरफ़,

इक किसी मज़लूम को अपना बनाकर देखिये।

उम्र भर “राही” दवावों से रहेंगे दूर आप,

सादगी से ज़िन्दगी अपनी बिताकर देखिये।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————

ये दुनिया मुझे आज़माने लगी है,

बुलंदी से नीचे गिराने लगी है।

कभी टूट कर प्यार मुझसे किया था,

मगर क्यों वो अब दूर जाने लगी है।।

खुले दिल से मिलते रहे थे मगर, वो,

कई राज़ दिल के छुपाने लगी है।।।।

नहीं देख पाती थी जो मेरे आँसू,

वो हर पल मुझे अब रुलाने लगी है।

लिपट कर जो साये से रहती थी हरदम,

वो मिलने से नज़रें चुराने लगी है।।

जिसे तीरगी रास आती नहीं थी,

चराग़ों को क्यों अब बुझाने लगी है।

बहुत साफ थे पैरहन जिसके “राही”

वो दामन में काँटे उगाने लगी है।।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414 ।

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एक नई ग़ज़ल सूफी सुरेश चतुर्वेदी जी

की कलम से

मेरी गहराई में बन कर समंदर झांकता है,

न जाने कौन है जो मेरे अन्दर झांकता है.

ख़ुद अपने आप से डर कर सिमट जाता है ख़ुद में,

किसी भी आईने में जब भी पत्थर झांकता है.

बदन में कर्बला बन कर कोई लेता है साँसें ,

लहू में जब कहीं भी प्यासा ख़जर झांकता है.

रहा करते हैं दोनों साथ और दोनों हैं ख़ाली,

यही बस सोच कर मुझमें मेरा घर झांकता है.

मुझे बचपन से माँ कहती रही है जाने क्यूँ ये ,

मेरी ऐडी से से इक छोटा सा नश्तर झांकता है.[नश्तर=कांटा]

मेरे दिल में यक़ीनन ही है रोशनदान कोई,

किसी की याद का जिससे कबूतर झांकता है.

उसे दिखतीं हैं चारों ही तरफ़ लाशें ही लाशें ,

कभी ख़ुद में ही जब कोई सितमगर झांकता है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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पेश है एक और ताज़ातरीन ग़ज़ल———

आये जो आप घर मेरे मौसम बदल गया,

यह देख दुश्मनों का जनाजा निकल गया।

जो शक़ की निगाहों से मुझे देखते रहे,

उनको मेरे ही सामने कोई कुचल गया।

ग़ैरों की ख़ुशी देख के सदमें में जो रहा,

बेवक़्त मर के आख़िरस दुनिया से कल गया।

शोहरत भी उसके हाथ में आकर चली गई,

हाथी किसी ढलान से गोया फिसल गया।

सूरज भी था शबाब पर जलता रहा बदन,

ऐसी लगी वो आग नगर सारा जल गया।

उस ज़लज़ले के बाद का मंज़र तो देखिये,

सहरा जो जल रहा था कल दरिया में ढल गया।

चाहा न जिसको प्यार से मैंने कभी ” राही ”

उस नाज़नीं को देख के दिल क्यों फिसल गया।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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मेरी कलम से एक ग़ज़ल जिंदगी की…….

खुशी के बुलबुले हैं कुछ, गमों का बोलबाला है

हँसी के हौसलों ने आज तक हमको सम्हाला है

कई उम्मीद के बादल यहाँ छा कर नहीं बरसे

जमीं सब आस की प्यासी पड़ा सूखे से पाला है

बहुत मजबूर है ईमान अब सुनता नहीं कोई

खड़ा है सच सरे महफ़िल मगर होठो पे ताला है

नहीं कोई बचा अबतक खुदा की उस अदालत से

खरा इंसाफ है उसका तरीका भी निराला है

करम के साथ ही अंजाम है नेकी बदी का भी

इसी दिल मे खुदा का घर यही मंदिर शिवाला है

हरिशंकर पाण्डेय

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पेश है एक नाज़ुक ग़ज़ल—

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सुनो आज वादा निभाने का दिन है,

नई शाख पे गुल खिलाने का दिन है।

शब-ए-वस्ल में यूँ न शर्माओ जानम,

ये दिल खोलकर गुदगुदाने का दिन है।

जवां जोश में पाँव फिसले हों शायद,

उसे आज अब भूल जाने का दिन है।

जो ग़ज़लें क़िताबों में हैं क़ैद अब तक,

उन्है बज़्म में गुनगुनाने का दिन है।।

मोहब्बत के गौहर जो पाये हैं हमने,

उन्हें अपने दिल में छुपाने का दिन है।

मुकम्मल है कितनी मोहब्बत ये अपनी,

इसे आज ही आज़माने का दिन है।।

जहाँ तुम मिले थे डगर में अकेले,

वहीं”राही”घर इक बनाने का दिन है।

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078,9893502414

💐💐💐💐💐ग़ज़ल💐💐💐💐💐

गीत के सुर को सजा दे , साज ऐसा चाहिए

दिल तलक पहुँचे सदा अल्फ़ाज़ ऐसा चाहिए

कुछ छिपायें कुछ बतायें, फितरतें इंसान की

जब खुले खुशियाँ बिखेरे , “राज ” ऐसा चाहिए

राह खुद अपनी बनाये फिर सजाकर मंज़िलें

रुख हवा का मोड़ दे ‘अंदाज़’ ऐसा चाहिए

जीत ले हर एक बाज़ी हौसले के जोर से

नाज़ हो अंजाम को, “आगाज़” ऐसा चाहिए

जो हटे पीछे कभी ना, जंग में डटकर लड़े

वीरता भी हो फिदा , “ज़ांबाज ” ऐसा चाहिए

हरिशंकर पाण्डेय

**************ग़ज़ल*************

गम के साये से घिरे दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी हर वफा का मैं सिला न दे पाया

मेरे ही दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !!

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे बैठे हैं,

छलक जायें न कहीं , सामने आऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल भी नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!!

मैंने सोचा था, बहुत दूर चला जाऊँ पर,

तुम न भूलोगी मुझे, मै भी भूलाऊँ कैसे!!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

————————————————–

एक ताज़ातरीन ग़ज़ल——

“”””””””””””””””””””””””

ये चिलमन में चेहरा छुपाओ न ऐसे,

मिरे दिल की धड़कन बढ़ाओ न ऐसे।

तुम्हें भर नज़र देखना चाहता हूँ,

नज़र फेरकर अब सताओ न ऐसे।

यही मेरी चाहत है दिल में रहो तुम,

किसी और से दिल लगाओ न ऐसे।

जो उल्फ़त के दीपक जलाये थे मैंने,

हवा दे के उसको बुझाओ न ऐसे।।

सफ़र है कठिन दूर मंज़िल है अपनी,

सरे राह काँटे। बिछाओ न ऐसे।।

बहुत आज़माया है लोगों ने मुझको,

मुझे और तुम आज़माओ न ऐसे।।

मोहब्बत अगर तुमको मुझसे है “राही”

तो बाहें झटक करके जाओ न ऐसे।।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

*************************************”

एक ग़ज़ल

“ये ज़मीं और आस्माँ हूँ मैं,

बेख़बर हूँ मगर कहाँ हूँ मैं ।

जिनमें हर सू उजाले रहते हैं,

उन अँधेरों का कारवाँ हूँ मैं ।

जिसमें कुछ वक़्त ही फ़क़त ठहरा,

भूला-बिसरा वो आशियाँ हूँ मैं ।

मुझसे क्यों दूर-दूर रहती है,

ज़िन्दगी तेरी दास्ताँ हूँ मैं ।

वक़्त से चोट खाए ज़ख़्मों का,

मुस्कराता हुआ निशाँ हूँ gb मैं ।

इक जगह होता गर बता देता,

कौन जाने कहाँ-कहाँ हूँ मैं ।

ज़ीस्त की क़ैद में ‘असर’ सिमटा,

सिर्फ़ उठता हुआ धुआँ हूँ मैं ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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नई गज़ल

यही सवाल अब …. उलझा, मेरे फसाने मे l

कम थी उल्फत..क्या मेरे दिल के आशियाने में !

गर खता थी कुछ हमारी तो बस बता देते ,

हम तो माहिर हैं, किसी भी तरह मनाने में ..!

उनकी यादें भी वफादार हैं , बसी दिल में,

कौन कहता है , वफ़ा है नहीं ज़माने में !

अब तो तूफान का भी खौफ नहीं है मुझको ,

दिये बुझा कर मैं बैठा गरीबखाने में ….

तुम्हारी रूठने की यह अदा बड़ी कातिल,

क्या मिलेगा तुम्हे ऐसे हमें सताने में ..

मगर यकीन है, दावा है, अपनी चाहत पर,

तुम्हारे हाँथ बढेंगे , दिये जलाने में ….

हरिशंकर पाण्डेय

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नई ग़ज़ल

मिलेगा मर्तबा , हस्ती को बचाये रखना !

सफर के वास्ते, कश्ती को सजाये रखना !

कहीं तूफाँ तुम्हारा रास्ता क्या रोकेगा ,

अपनी यारी यूँ समुन्दर से बनाये रखना !

जतन से ध्यान से रिश्तों को सम्हाले रखना,

गुलों से प्यार के गुलशन को सजाये रखना!

बड़ी है अहमियत , किरदार की यकीं मानो,

बड़ा अजीज है , हर वक़्त निभाये रखना !

हुनर सफर में बुलंदी तलाश ले फिर भी ,

रहे गरूर ना नजरों को झुकाये रखना !

भले हो सामना हर बार इम्तिहाँ से सुनो ,

अपनी तालीम को जेहन में बसाये रखना !

वतन की मिट्टी के अनमोल नगीने बनकर ,

इसकी तहजीब और शोहरत को उठाये रखना !

हरिशंकर पाण्डेय

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ग़ज़ल संग्रह “चले भी आओ”से एक ग़ज़ल—

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तुम्हारा शर्म से नज़रें झुकाना याद है हमको,

वो दिलकश प्यार के नग़में सुनाना याद है हमको।

तुम्हारी जिन अदाओं ने हमें शायर बनाया है,

मुसल्सल हर अदा वो क़ातिलाना याद है हमको।

कली से फूल बनकर तुमने जब अंगड़ाइयाँ ली थी,

घटा में बिजलियों का कौंध जाना याद है हमको।

झलक पाकर तुम्हारी खिल उठे जब फूल सहरा में,

परिंदों का मिलन के गीत गाना याद है हमको।।।

तुम्हारा ज़ुल्फ़ लहराना वो दिन में रात हो जाना,

सितारों का फ़लक़ पे झिलमिलाना याद है हमको।

मज़ा आया तुम्हारे गेसुओं से जब हुई बारिश,

उन्हीं रिमझिम फुहारों में नहाना याद है हमको।

खिला चेहरा तुम्हारा देखकर उस चाँद का “राही”

दुबक कर बादलों में मुँह छुपाना याद है हमको।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078, 9893502414

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**ग़ज़ल**

गम के साये से घिरे, दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी ही वफा वाजिब , कसूर मेरा था ,

अपने इस दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे हैं जाकर ,

छलक जायें न कहीं , सामने जाऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल यूँ ,नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

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—————- एक ग़ज़ल————

दफ़अतन दर्द-ए-जिगर कोई बढ़ाकर चल दिया,

बिन धुआँ बिन आग के तनमन जलाकर चल दिया।

कुछ ग़लत करते जो चारागर को पकड़ी भीड़ ने,

शर्म से वो कुछ न बोला सर झुकाकर चल दिया।

मुल्क के नामी अदीबों से सजी उस बज़्म में,

एक बच्चा आईना सबको दिखाकर चल दिया।

वो फ़रिश्ता, रौशनी जिसने न देखी थी कभी,

जाते-जाते नूर की दौलत लुटाकर चल दिया।

मैंने इक शम्मा जलाई थी अमन के वास्ते,

अम्न का दुश्मन कोई आया बुझाकर चल दिया।

है जो जन्नत सरज़मीं का वादी-ए-कश्मीर है,

कौन उसमें आग नफ़रत की लगाकर चल दिया।

जब भरी हुंकार “राही” भारती के लाल ने,

जानी दुश्मन सरहदों से तिलमिलाकर चल दिया।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078,9893502414

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फासला दरमियाँ रखा ही नहीं,

यार फिर भी हमें मिला ही नहीं.

एक बच्चा है मुझमें ऐसा भी,

उम्र भर जो कभी हंसा ही नहीं.

इन दरख्तों के झुलसे जिस्मों पर,

अबके मौसम ने कुछ लिखा ही नहीं.

प्यासे कूए ने नेकियों से कहा,

नेकियों का सिला मिला ही नहीं.

मेरी ग़ज़लें तो माँ के जैसी हैं,

जिनके होठों पे बददुआ ही नहीं.

एक लम्हा भी चैन से न कटा,

उम्र कैसे कटी पता ही नहीं.

उस से बिछड़ा नहीं घड़ी भर भी ,

उम्र भर जो मेरा हुआ ही नहीं.

उसकी ग़ज़लों का ऐसा शेर हूँ मैं,

जो मुक्कमल कभी हुआ ही नहीं.

मुक़म्मल =पूरा

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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“””””””””””””””””””””””””””””””””””””

—-ग़ज़ल—

मुझे ज़िंदगी रास आई न तुम बिन,

गुलों की ये ख़ुशबू भी भाई न तुम बिन।

धरा तप रही थी बदन जल रहा था,

ये सावन की रिमझिम सुहाई न तुम बिन।

कई साल गुज़रे हैं तन्हाईयों में,

कभी कोई महफ़िल सजाई न तुम बिन।

कमाई की राहें बहुत थीं नज़र में,

मगर कोई जोखिम उठाई न तुम बिन।

जगाई थी जो रूह में प्यास तुमने,

किसी ने भी उसको बुझाई न तुम बिन।

किसी ने भी मंदिर का खोला न ताला,

किसी ने भी शम्मा जलाई न तुम बिन।

बहुत हैं यहाँ चाहने वाले “राही”,

किसी को मेरी याद आई न तुम बिन।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक नज़्म ( कविता )

☆कहर इक तूफान का, कैसी तबाही दे गया☆

कहर इक तूफान का, कैसी “तबाही” दे गया I

आशियाना हर “परिन्दे” का उड़ा कर ले गया

जड़ से उखड़े कुछ दरख्तों का मिटा नामोनिशां ,

अब फिज़ा वीरान लगती , दर्द कैसा दे गया !

काल की आँधी थी वो उसने किया बर्बाद सब,

मौत का तांडव मचाकर पीर भारी दे गया।

जिनके अपने थे गए अब लौटना मुमकिन नहीं,

अश्क़ का सैलाब देकर सारी खुशियाँ ले गया।

अब तो कलियों और फूलों की महक फीकी हुई ,

सब तितलियों में उदाशी, जोश गुलशन से गया !

इक हवा के तेज झोंके से सहम जाते हैं अब,

खूब ज़ालिम था वो तूफां, खौफ दिल में दे गया !

सरजमी पर लौट आये सब कहाँ रुकते भला

अब परिन्दों को बनाना है नया इक आशियाँ !

हरिशंकर पाण्डेय-हरिशंकर-9967690881

hppandey59@gmail.com

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एक ताज़ा ग़ज़ल——————-

आज़माना चाहते हो आज़माकर देख लो,

मैं संभलता ही रहूँगा तुम गिराकर देख लो।

मैं तसव्वुर से तुम्हारे जा न पाउँगा कभी,

कोशिशें कर लो मुसल्सल औ भुलाकर देख लो।

टूट जाऊँ मैं ज़रा सी बात पर मुम्किन नही,

हो यकीं तुमको न,घर मेरा जलाकर देख लो।

पायलें छम छम करेंगी जब पढूँगा मैं ग़ज़ल,

चाँदनी शब में सनम महफ़िल सजाकर देख लो।

तुम अकेले रह न पाओगे ये दावा है मेरा,

कुछ दिनों को घर अलग अपना बसाकर देख लो।

चाँद धरती पर उतर आयेगा काली रात में,

तुम ज़रा चेहरे से ये चिलमन हटाकर देख लो।

आग लग जायेगी पानी में है “राही” को यकीं,

आज बेपर्दा नदी में तुम नहा कर देख लो।।

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प्यार करोगे प्यार मिलेगा,

अपनों का संसार मिलेगा ।

दिल से फ़र्ज़ निभाओगे जब,

जो चाहो अधिकार मिलेगा।।

जब अवाम का काम करोगे,

फूलों का तब हार मिलेगा।।

सोच लूट की छोड़ो वार्ना,

हर रस्ते पर खार मिलेगा।

चाल ढाल बदलो ख़ुद अपनी,

तभी तुम्हें दिलदार मिलेगा।।

जिसे खोजते हो बरसों से,

वो दरिया के पार मिलेगा।

महफ़िल तभी सजेगी “राही”

जब कोई फ़नकार मिलेगा।

“राही” भोजपुरी , जबलपुर मध्य प्रदेश ।

07987949078, 09893502414

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एक ग़ज़ल श्री अनिल कुमार राही की कलम से

ज़रा-सी बात पर हो तुम ख़फा अच्छा नहीं लगता।

जुदा होकर रहे फिर गमज़दा अच्छा नहीं लगता।।

बहारें चूमती दामन न जाओ छोड़कर मुझको।

तुम्हारे बिन कोई मौसम जरा अच्छा नहीं लगता।।

हुए मशहूर हम इतने ज़माने की नज़र हम पर।

तुम्हे कोई कहे अब बेवफा अच्छा नहीं लगता।।

खुदाया रूठ जाये तो कसम रब की करूँ सजदा।

जुनूने इश़क में ये आसरा अच्छा नहीं लगता।।

मुहब्बत पर भरोसा कर लिए हैं आँख में आँसू।

बगावत का सलीका यूँ डरा अच्छा नहीं लगता।।

जुड़ी है हर खुशी तुमसे हकीक़त यह खुदा जाने।

नुमाॅया हो वफ़ा यह फलसफा अच्छा नहीं लगता।।

तुम्हारा साथ था राही खुदाई साथ थी अपने।

मगर अब प्यार का वो तज़किरा अच्छा नहीं लगता।।

(अनिल कुमार राही)

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भालू का साथी हाथी

भालू का साथी हाथी

भालू बंदर उछल- कूद
कर खेल रहे थे बन में।
हवा तेज बहते बहते
तूफान बनी कुछ क्षण में।
भागा हिरण चौकड़ी भरकर
खुली जगह पर आया।
भागे सारे बंदर, मोटा-
भालू भाग न पाया।

भालू मामा उतरे गड्ढे में
ताकी बच जाएॅ॑।
गिरा पेड़ इक वहीं, फॅ॑से
नीचे वे निकल न पाए।
जुटे जानवर उन्हें बचाने की
सब युक्ति लगाई।
भारी पेड़ हटाने की सब
कोशिश काम ना आई।

आया शेर कहा पंजे की
ताकत मैं दिखलाऊॅ॑।
पेड़ हटाकर मैं भालू को
पल में बाहर लाऊॅ॑।
पेड़ दूर की बात एक
डाली भी हटा न पाया।
तबियत का फिर किया-
बहाना पीछे लौट के आया।

भालू ने अपने साथी
हाथी को फिर बुलवाया।
अपना खाना छोड़ के
हाथी दौड़ा दौड़ा आया।
पकड़ सूंड़ से अपने
उसने भारी पेड़ उठाया।

भालू मामा को संकट से
सचमुच  आज  बचाया।

हरिशंकर पांडेय “सुमित”




माता पिता बुजुर्ग से हर घर की शान है …..

माॅ॑ पर शायरी





माता पिता बुजुर्ग से हर घर की शान है
सन्मान उनका राम की पूजा समान है

वह माॅ॑गती है सब कुछ औलाद के लिए
ख़ुद के लिए उसकी कोई मन्नत नहीं होती
पाला हमें यूं जान से बढ़कर सदा “सुमित”
माॅ॑ से बड़ी ज़हान में जन्नत नहीं होती

कौन कहता है कि भगवान को नहीं देखा
माॅऺऺ॑ की सूरत में ही भगवान नज़र आया हैं

माँ के हाँथों की रोटियों में बड़ी लज्ज़त थी,
किसी निवाले में अब वह मज़ा नहीं आता!

तारों के बीच एक चांद आसमान में।
माॅ॑ के समान कोई नहीं है जहान में।

हरिशंकर पाण्डेय “सुमित”


बटुक लाल ने किया कमाल



बटुक लाल ने किया कमाल।
बटुक लाल ने किया कमाल।

बटुक लाल की बड़ी दुकान
बिकते थे सारे सामान।
खाते रहते थे वे पान
बनिया थे वे चतुर सुजान।

प्रेम से पूॅ॑छे सबका हाल
बटुक लाल ने किया कमाल।

दो बदमाश अचानक आए
माॅ॑गे पैसे फिर धमकाए।
बटुक लाल पहले घबराए
देता हूॅ॑ कह अंदर आए।

डिब्बा तेल का लिया निकाल
बटुक लाल ने किया कमाल।

डिब्बा नीचे दिया ढकेल
फर्श पे पूरे फैला तेल।
बदमाशों का बिगड़ा खेल
फिसले, गिरे, हुए वे फेल।

पकड़ लिया सबने तत्काल
बटुक लाल ने किया कमाल।

उनको मिलकर पीटे सारे
दिखा दिए दिन में ही तारे।
पुलिस – दरोगा वहाॅ॑ पधारे
दोनों पहुंचे जेल के द्वारे।

हीरो बने हुए खुशहाल
बटुक लाल ने किया कमाल।

हरिशंकर पाण्डेय “सुमित”


मुक्तक शेर और ग़ज़ल बहार

हमे गम की घटाओं के अँधेरे क्या डरायेंगे
छटेंगे दुःख भरे बादल, सितारे मुस्करायेंगे
सलीके से चले हैं हौसले का थाम कर दामन
यक़ीनन कामयाबी का नया गुलशन सजायेंगे

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित”

कुछ करने का सच्चा जुनून, जज़्बे का साथ निभाता है।
परवाज़ हौंसले की पाकर, जाँबाज़ कहाँ रुक पाता है!!
जो इन्कलाब का नारा दे , कर दे कुर्बान जवानी को ,
आज़ादी का मक़सद लेकर,वह भगत सिंह बन जाता है!!

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित’
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कितनी बड़ी उड़ान मुझे दे गया है वो, काग़ज़ का आसमानकितनी बड़ी उड़ान मुझे दे गया है वो, काग़ज़ का आसमान मुझे दे गया है वो. साँसों के दरमियान मुझे दे गया है वो , रूहानी ज़ाफ़रान मुझे दे गया है वो. आएगा लौट कर कभी वो बादलों के साथ , कुछ ऐसा इत्मीनान मुझे दे गया है वो. तितली के पंख,रंगो-बू ग़ज़लों में ढाल कर , फूलों की इक ज़ुबान मुझे दे गया है वो. चलता है अब तो मुझपे फ़क़त ख़ुद का ही निज़ाम, ये कैसा हुक्मरान मुझे दे गया है वो. आँखों में उसको लेके मैं चलता हूँ रात -दिन, ख़्वाबों का इक जहान मुझे दे गया है वो. लगता नहीं है धूप में भी धूप का सफ़र, अब ऐसा सायबान मुझे दे गया है वो. लिख कर बदन पे प्यार से ,मिटटी के क़ायदे, साँसों का संविधान मुझे दे गया है वो. अश्कों से मैं बुझाउँगा जिसको तमाम उम्र, जलता हुआ मकान मुझे दे गया है वो. -सुरेन्द्र चतुर्वेदी लाइक पेज को देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें, https://www.facebook.com/pages/Surendra-Chaturvedi/1432812456952945?ref=hl मुझे दे गया है वो. साँसों के दरमियान मुझे दे गया है वो , रूहानी ज़ाफ़रान मुझे दे गया है वो. आएगा लौट कर कभी वो बादलों के साथ , कुछ ऐसा इत्मीनान मुझे दे गया है वो. तितली के पंख,रंगो-बू ग़ज़लों में ढाल कर , फूलों की इक ज़ुबान मुझे दे गया है वो. चलता है अब तो मुझपे फ़क़त ख़ुद का ही निज़ाम, ये कैसा हुक्मरान मुझे दे गया है वो. आँखों में उसको लेके मैं चलता हूँ रात -दिन, ख़्वाबों का इक जहान मुझे दे गया है वो. लगता नहीं है धूप में भी धूप का सफ़र, अब ऐसा सायबान मुझे दे गया है वो. लिख कर बदन पे प्यार से ,मिटटी के क़ायदे, साँसों का संविधान मुझे दे गया है वो. अश्कों से मैं बुझाउँगा जिसको तमाम उम्र, जलता हुआ मकान मुझे दे गया है वो. -सुरेन्द्र चतुर्वेदी लाइक पेज को देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें, https://www.facebook.com/pages/Surendra-Chaturvedi/1432812456952945?ref=hlकितनी बड़ी उड़ान मुझे दे गया है वो, काग़ज़ का आसमान मुझे दे गया है वो. साँसों के दरमियान मुझे दे गया है वो , रूहानी ज़ाफ़रान मुझे दे गया है वो. आएगा लौट कर कभी वो बादलों के साथ , कुछ ऐसा इत्मीनान मुझे दे गया है वो. तितली के पंख,रंगो-बू ग़ज़लों में ढाल कर , फूलों की इक ज़ुबान मुझे दे गया है वो. चलता है अब तो मुझपे फ़क़त ख़ुद का ही निज़ाम, ये कैसा हुक्मरान मुझे दे गया है वो. आँखों में उसको लेके मैं चलता हूँ रात -दिन, ख़्वाबों का इक जहान मुझे दे गया है वो. लगता नहीं है धूप में भी धूप का सफ़र, अब ऐसा सायबान मुझे दे गया है वो. लिख कर बदन पे प्यार से ,मिटटी के क़ायदे, साँसों का संविधान मुझे दे गया है वो. अश्कों से मैं बुझाउँगा जिसको तमाम उम्र, जलता हुआ मकान मुझे दे गया है वो. -सुरेन्द्र चतुर्वेदी लाइक पेज को देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें, https://www.facebook.com/pages/Surendra-Chaturvedi/1432812456952945?ref**=hl****************************

जब तक कदम रुके रहे तो तेज थी हवा
नजरें उठाई जैसे तूफान रुक गया
एक *पैतरे के साथ ही बिजली चमक उठी
उसने उड़ान ली तो आसमान झुक गया

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

***********************************

हमारी ज़िन्दगी में याद की अपनी अहमियत है,
कभी वे इक महकती, खुशनुमा अहसास होती हैं !
सिमटकर कर वह भिगाती हैं कभी मासूम पलकों कों,
नहीं मिटती हमारे मन से, दिल के पास होती हैँ !!

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

***********************************

उनके रुख़ पर जो मुस्कराई है उल्फ़त की कली,
तैरती है हया , पलकों का सहारा लेकर !!
होठ हिलकर रुके, खामोश जुबां कह न सकी,
बात कहदी , हसीं नजरों ने इशारा देकर !!!

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

************************************

कड़कती धूप मे मजदूर करते हैं बड़ी मेहनत,
मिले दो वक्त की रोटी, यही अरमान रखते हैं।
पसीने से नहा कर, काम को अंज़ाम देकर ये,
गरीबी मे भी चेहरे पर मधुर मुस्कान रखते हैं!!

‘सुमित’
*************************************
कोई बँगलों में रहता है,किसी के छत नहीं सर पर।
किसी की फ़र्श संगमरमर, कोई है तोड़ता पत्थर।
बड़ा मंजर अज़ब देखा,कोई मोहताज़ निदिया का,
कोई है चैन से सोया, खुली फुटपाथ पर जा कर!

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

**************************************

बुजुर्गों की दुआ अपना असर हरदम दिखाती है
हुनर जीने का हमको जिंदगी में भी सिखाती है
अदब से सर झुकाना भी बुजुर्गों से ही सीखा है
अगर तूफाँ में कश्ती हो किनारा पा ही जाती है

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

**************************************

आदमी बस ढूँढ़ता है, एक शुकूँ की ज़िन्दगी,
सिर्फ दौलत ही नहीं, सब कुछ है इस संसार में l
हसरतें पूरी हो सब, यह तो कभी मुमकिन नहीं,
हर ख़ुशी बिकती नहीं, दुनिया के इस बाजार में !

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

मै ढूढ़ता रहा जिसे, शहरों में बार बार,
घर तो मिले बड़े,मगर आँगन नही मिला!
दौलत की चकाचौंध के मंज़र बहुत दिखे,
पर झूमता हुआ मुझे सावन नहीं मिला!

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

****************************************

हमारे जांबाज़ वीर जवानों के लिए कुछ पंक्तियाँ
उनके जज़्बे को शत-शत नमन..

मोहब्बत है वतन से ये, कभी पीछे नहीं हटते,
हमेशा सरहदों पर जान की बाजी लगाते हैं!
हिफाज़त में वतन की,रहते हैं हर पल ये चौकन्ने,
नहीं डर है इन्हे ये मौत से आँखे लड़ाते हैं।

हजारों फिट की ऊँचाई, जहाँ जीना ही मुश्किल है,
वहां जांबाज़ बढ़ कर जंग में जलवा दिखाते हैं।
डटे रहते हैं , बर्फीली हवा के बीच रातों में,
निभाते फर्ज़ हैं वो, हम शुकूं की नींद पाते हैं।

ll जय हिन्द ll

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

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जाति, धर्म, धन, दौलत की कोई दीवार नहीं होती!
है बड़ी दोस्ती की हस्ती, हरगिज़ लाचार नहीं होती !
जब याद करे एक मित्र कभी,दूजे तक बात पहुँचती है,
हो सखा “कन्हैया” जैसा तब, दूजी दरकार नहीं होती

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

कुछ मशहूर कुछ ताज़ातरीन शेर

जीत लो हर एक बाजी हौसले के जोर से
नाज़ हो अंजाम को आगाज़ ऐसा चाहिए

ये कुदरत के नजारे भी हमें जीना सिखाते हैं
भरो कुछ रंग जीवन में हमें यह भी दिखाते हैं

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित’

हमे गम की घटाओं के अँधेरे क्या डरायेंगे
छटेंगे दुःख भरे बादल, सितारे मुस्करायेंगे
सलीके से चले हैं हौसले का थाम कर दामन
यक़ीनन कामयाबी का नया गुलशन सजायेंगे

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित’
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हमसे हुए वे दूर क्या अब हम बिखर गए
आंखों में मेरे बेशुमार अश्क भर गए
सब लोग मेरे ज़ख्म ढूंढते रहे मगर
हम अपने दर्द से ही कई बार मर गए

अनिल कुमार राही
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किसी भी दिल पे झुर्रियां कभी नहीं पड़ती
वह धड़कता है इसलिए जवान रहता है

दोस्तों, ग़ज़ल की बात जब चलती है तो दिल को एक खुशनुमा एहसास होने लगता है। ग़ज़ल को पढ़ने या सुनने से दिल को बड़ा सुकून मिलता है।

दोस्तों इस पोस्ट में आपको मेरी गज़लों के साथ-साथ अच्छे गजलकारों की गजलें भी पढ़ने को मिलेगी। मैं आशा करता हूं यह गजलें आपको बहुत पसंद आएंगी।

ग़ज़ल की दुनिया की शुरुआत मैं अपने एक शेर के साथ कर रहा हूं। पेश-ए-खिदमत है।

पीर जब दिल से निकल कर शायरी में आयेगी
एक संजीदा ग़ज़ल तहरीर में ढल जायेगी

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ग़ज़ल की दुनिया

दोस्तों,ग़ज़ल को पढ़ने या सुनने से दिल को बड़ा सुकून मिलता है।

दोस्तों इस पोस्ट में आपको मेरी गज़लों के साथ-साथ अच्छे गजलकारों की गजलें भी पढ़ने को मिलेगी। मैं आशा करता हूं यह गजलें आपको बहुत पसंद आएंगी।

ग़ज़ल की दुनिया की शुरुआत मैं अपने एक शेर के साथ कर रहा हूं। पेश-ए-ख़िदमत है—

पीर जब दिल से निकल कर शायरी में आयेगी

एक संजीदा ग़ज़ल तहरीर में ढल जायेगी

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ग़ज़ल का अंदाज

लुटे ख़्वाबों की पनाहों में ग़ज़ल होती है,

किए वादों के गुनाहों में ग़ज़ल होती है।

मिटें जो मुल्क में चैनो-अमन लाने के लिए,

उनकी हसरत भरी आहों में ग़ज़ल होती है।

निकल पड़े जो सच की राह पर सभी के लिए,

उनकी गैरत भरी राहों में ग़ज़ल होती है।

खुशी देकर जो सभी को खुशी से झूम उठें,

उनकी पुरआब निगाहों में ग़ज़ल होती है।

वो जिन्हें इश्क़ में ख़ुदा के अक़्श जैसा दिखे,

उनकी फैली हुई बाहों में ग़ज़ल होती है।

हुक़्मराँ ने किया आवाम को तबाह जहाँ,

वहाँ हर शख़्स की आहों में ग़ज़ल होती है।

उठे आवाज़ अगर सबकी बेहतरी के लिए,

तो उसकी नेक सलाहों में ग़ज़ल होती है।

Gopal S Singh

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एक खूबसूरत ग़ज़ल — दिल का टूटा हुआ आईना रह गया

दिल का टूटा हुआ… आईना रह गया,

ख़त मुकम्मल लिखा,बस पता रह गया

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फेर कर के नजर..,रास्ते चल पडे,

वो फसाना वहीं पर थमा रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

यादें दफना दीं सारी उसी घाट पर,

मेरे भीतर कहीं तू बचा रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

बातें होती रहीं ….आपसे रात भर,

दर्द दिल का मगर अनकहा रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

दुश्मनी थी उजालों को उस रात से,

ख्वाब आँखों में आके रुका रह गया,

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

जिस्म से रूह जैसा रहा साथ जब,

बीच में कैसे ये फासला रह गया,

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

है कयामत से बढ के सजा”मीरा”की,

और बाकी मेरे क्या ख़ुदा रह गया,

©कश्मीरा त्रिपाठी

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एक रूहानी ग़ज़ल——————-

कभी मेरे नज़दीक आकर तो देखो

मोहब्बत की शम्मा जलाकर तो देखो

महक जायेंगी आसमां तक हवायें

ये आँचल हवा में उड़ाकर तो देखो

न जी पाओगे चैन से एक शब भी

मुझे अपने दिल से भुलाकर तो देखो

निगाहों से मेरी नहीं बच सकोगे

कोई बात मुझसे छुपाकर तो देखो

संवर जायेगा ज़िंदगी का गुलिस्तां

किसी को भी अपना बनाकर तो देखो

न हो गर यकीं प्यार पे मेरे तुमको

बुरे वक़्त पे आज़माकर तो देखो

यक़ीनन सुकूँ चैन “राही” मिलेगा

मुझे प्यार से तुम मनाकर तो देखो

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक प्यारी ताज़ातरीन ग़ज़ल

हेलो,

ज़िन्दगी…

जिससे मिलने में हमको ज़माने लगे,

मिलते ही वो हमें आज़माने लगे ।

मुद्दतों बाद सच याद आया बहुत,

झूठ के जब ठिकाने ठिकाने लगे ।

जब भी ख़ामोशियों से मुलाकात की,

कुछ परिंदे वहाँ चहचहाने लगे ।

नींद भी उड़ गई चैन भी उड़ गया,

ख़ुद से क्या हम बहाने बनाने लगे ।

बारहा आईना देखना शौक था,

उम्र ढलते ही नज़रें चुराने लगे ।

बंद वीरान घर खोलते ही हमें,

गुज़रे पल पास अपने बुलाने लगे ।

सोचता हूँ अंधेरों में घर के शजर,

क्यौं हमें देखकर जगमगाने लगे ।

यादों ने फिर रुलाया हमें यूँ ‘असर’,

रोते-रोते ही हम मुस्कराने लगे ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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ताज़ातरीन गजल

सोच लेगा तू तो मैं तेरी रज़ा हो जाऊंगा.

मैं फकीरों की दुआ का सिलसिला हो जाऊंगा .

इक दफा कह दे कि तू है हान्सिले मंज़िल मेरी,

जिस्म से मैं रूह तक का रास्ता हो जाऊँगा.

बारगाहे इश्क की खुशबू हूँ मैं ,महसूस कर,

गर मुझे छूने कि ज़िद की तो हवा हो जाऊंगा.

जिस ग़ज़ल में तू मुसलसल बन के आयेगा रदीफ़ ,

उस गज़ल का मैं मुक्कमल काफ़िया हो जाऊंगा.

सूफ़ीयाना इश्क में है दिल फ़कीराना मेरा,

तुझमें शामिल अब किसी दिन शर्तिया हो जाऊंगा.

साँस गर लेती रही ,सांसों में मेरे बेखुदी ,

मैं फ़कीरों की मजारों का दिया हो जाऊंगा.

नूर तेरा आ रहा है मेरे चेहरे पे नज़र ,

इस से ज़्यादा अब खुदा मैं और क्या हो जाऊंगा.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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सुमन ढींगरा दुग्गल जी की कलम से—-

एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

कब कहाँ किस को दग़ा दे जानता कोई नहीं

ज़िंदगी सा बेमुरव्वत। बेवफा कोई नहीं

दिल कहीं पत्थर न हो जाए बस इतना याद रख

ये वो पत्थर है कि जिसको पूजता कोई नहीं

बेअसर हैं तेरी आहें उस पे तो हैरत न कर

पत्थरों का फूल से क्या वास्ता, कोई नहीं

भूल तो हर शख़्स से मुमकिन है हम हों आप हों

क्यूँ कि हम सब आदमी हैं देवता कोई नहीं

नफ़्सी नफ़्सी हर तरफ है कौन किस का है यहाँ

ए ख़ुदा तेरे सिवा अब आसरा कोई नहीं

बेखुदी का राज़ बतलाते हैं तुम को आज हम

हम ने उस को पा लिया जिस का पता कोई नहीं

दूर रहता है निगाहों से मेरी फिर भी ‘सुमन’

ज़हन ओ दिल में वो ही वो है दूसरा कोई नहीं

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माॅ॑

जहाॅ॑ माॅ॑ की दुआएॅ॑ हैं वहाॅ॑ डर हो नहीं सकता

ख़ुदा तो है ख़ुदा,माॅ॑ के बराबर हो नहीं सकता

नहीं मालूम हो रस्ता सफर का और मंज़िल भी

भले हो क़ाफ़ला-सालार, रहबर हो नहीं सकता

रहे ,बस रह लिये ता-उम्र यूॅ॑ ही कुछ मकानों में

मुहब्बत के बिना कोई मकाॅ॑,घर हो नहीं सकता

चलो, इस उम्र में अब आइने से दोस्ती छोड़ें

जवानी के दिनों में था जो मंज़र हो नहीं सकता

हमारी ज़िन्दगी हमको हमेशा ये सिखाती है

मिलें मजलूम की आहें,सिकंदर हो नहीं सकता

जिसे माॅ॑-बाप की अपने दुआ हासिल नहीं होती

किसी औलाद को रुतबा मयस्सर हो नहीं सकता

हवेली हो शहर में और सब सामान, सुविधाएॅ॑

मगर ये गाॅ॑व के घर के बराबर हो नहीं सकता

किशन स्वरूप

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पेश है एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————-

आग दिल में है लगी इसको बुझायें कैसे,

जिससे उम्मीद थी रूठा है मनायें कैसे।।

हम दुखी होते हैं तो रोती हैं आँखें उसकी,

ऐसे हमदर्द को बोलो तो भुलायें कैसे।।।।

ये तो सच है कि वो हमको ही चाहता है फक़त,

वो मगर दूर है फिर प्यार जतायें कैसे।।।।

बाद मुद्दत के सजाई है प्यार की महफ़िल,

ज़िद्दी तूफ़ान में अब शम्मा जलायें कैसे।।

एक अर्से से हमें नींद नहीं आई है,

कोई बतलाये उसे ख़्वाब में लायें कैसे।

है नदी पार की बस्ती में बसेरा उसका,

कोई जरिया नहीं जाने का तो जायें कैसे।

अब उसे हम पे भरोसा ही नहीं है “राही”

उससे अब दिल की कोई बात बतायें कैसे।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक संज़ीदा ग़ज़ल

आज दरिया चली ख़ुद लहर ढूढ़ने,

तल्खियों में बसा खुश शहर ढूढ़ने।

आज आबो – हवा है निराली बहुत,

जिन्दगी जब चली खुद ज़हर ढूढ़ने।

सब मसीहा अमन के बने फिर रहे,

है चला जब अमन ख़ुद बशर ढूढने।

ख़्वाब पाले, बढ़े तिस्नग़ी से सजे,

रूह को दे सुकूँ वो दहर ढूढ़ने।

दौर है बे-अदब शानो-शौक़त का ये,

सादगी में चले सब कहर ढूढ़ने।

आदमी,आदमी के गले मिल रहा,

“अपने काटे का ज़िन्दा असर”ढूढ़ने।

तोड़ती साँस अब सादगी कह रही,

दफ़्न हो मैं चली खुश-ज़िगर ढूढ़ने।

Gopal S Singh

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ग़ज़ल

जब उठी आवाज मुफ़्लिश की वो दबवाई गयी ।

हर दफा झूठी फ़क़त तस्बीर दिखलाई गयी ।

मुश्किलें आसान हैं दौलत के दम पर इस कदर

जेब है भारी उसे हर चीज दिलवायी गयी ।

पिस रही है अब गरीबी कुछ सियाशी पाट में

मज़हबी, क़ौमी सवालों में ये उलझाई गयी।

एक चिनगारी जो भड़की आग बढ़ती ही गयी

हुक्मरानों तक बजा फ़रियाद पहुँचाई गयी।

सूरतें बदलें ‘सुमित’ तब तो बने कुछ बात भी

अब तलक वादों की बस आवाज सुनवाई गयी।

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित’

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

जनाज़ा किसी का उठा ही नहीं है,

मरा कौन मुझमें पता ही नहीं है.

मुझे खो दिया और लगा उसको ऐसा,

कि जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं है.

ये कैसी इबादत ये कैसी नमाज़ें,

ज़ुबां पर किसी के दुआ ही नहीं है.

चले जिस्म से रूह तक तो लगा ये,

बिछुड़ वो गया जो मिला ही नहीं है.

यूँ कहने को हम घर से चल तो दिए हैं,

मगर जिस तरफ़ रास्ता ही नहीं है.

ख़ताओं की वो भी सज़ा दे रहे हैं,

गुनाहों के जिनकी सज़ा ही नहीं है.

पसीने से मैं अपने वो लिख रहा हूँ,

जो क़िस्मत में मेरे लिखा ही नहीं है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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मनोज राठोर ‘मनुज’ जी की कलम से…..

कह दो वफ़ा कुबूल है क्यों कश्मकश में हो

बाकी तो सब फिजूल है क्यों कश्मकश में हो

जिस पर तुम्हें गुरुर तुम्हारा बदन नहीं

यह तो जमीं की धूल है क्यों कशमकश में हो

मिलता उसे ही कुछ है जो खोता है कुछ यहां

जग का यही उसूल है क्यों कशमकश में हो

उजड़े हुए चमन से जो खुशबू सी आ रही

जिंदा कोई तो फूल है क्यों कशमकश में हो

दे दो सजा या छोड़ दो उल्फ़त तो की मनुज

इतनी सी अपनी भूल है क्यों कशमकश में हो

मनोज राठौर मनुज

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल आपके हवाले———

ख़ुद किसी की याद में दिल को जलाकर देखिये,

और फिर उसके लिये जग को भुलाकर देखिये।

पुरसुकूं दिल को मिलेगा काम ये जो कर दिये,

रो रहा बच्चा कोई उसको हँसाकर देखिये।।।

उनकी शोहबत में मिलेगी आप को शोहरत ज़रूर,

बस किसी महफ़िल में उनको तो बुलाकर देखिये।

राह-ए-उल्फ़त में फक़त गुल ही नहीं काँटे भी हैं,

आज़माना हो,किसी से दिल लगाकर देखिये।।

आप को भी चाहने वाले मिलेंगे बेशुमार,

बस किसी के दर्द में आँसू बहाकर देखिये।

दूर रहकर दिलरुबा से चैन किसको है मिला,

है नहीं गर चे यकीं बस आज़माकर देखिये।

प्यार करने का अगर करते हैं दावा आप तो,

लाख मुश्किल हो तो क्या फिर भी निभाकर देखिये।

आप का ही तज़किरा होगा शहर में तरफ़,

इक किसी मज़लूम को अपना बनाकर देखिये।

उम्र भर “राही” दवावों से रहेंगे दूर आप,

सादगी से ज़िन्दगी अपनी बिताकर देखिये।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————

ये दुनिया मुझे आज़माने लगी है,

बुलंदी से नीचे गिराने लगी है।

कभी टूट कर प्यार मुझसे किया था,

मगर क्यों वो अब दूर जाने लगी है।।

खुले दिल से मिलते रहे थे मगर, वो,

कई राज़ दिल के छुपाने लगी है।।।।

नहीं देख पाती थी जो मेरे आँसू,

वो हर पल मुझे अब रुलाने लगी है।

लिपट कर जो साये से रहती थी हरदम,

वो मिलने से नज़रें चुराने लगी है।।

जिसे तीरगी रास आती नहीं थी,

चराग़ों को क्यों अब बुझाने लगी है।

बहुत साफ थे पैरहन जिसके “राही”

वो दामन में काँटे उगाने लगी है।।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414 ।

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एक नई ग़ज़ल सूफी सुरेश चतुर्वेदी जी

की कलम से

मेरी गहराई में बन कर समंदर झांकता है,

न जाने कौन है जो मेरे अन्दर झांकता है.

ख़ुद अपने आप से डर कर सिमट जाता है ख़ुद में,

किसी भी आईने में जब भी पत्थर झांकता है.

बदन में कर्बला बन कर कोई लेता है साँसें ,

लहू में जब कहीं भी प्यासा ख़जर झांकता है.

रहा करते हैं दोनों साथ और दोनों हैं ख़ाली,

यही बस सोच कर मुझमें मेरा घर झांकता है.

मुझे बचपन से माँ कहती रही है जाने क्यूँ ये ,

मेरी ऐडी से से इक छोटा सा नश्तर झांकता है.[नश्तर=कांटा]

मेरे दिल में यक़ीनन ही है रोशनदान कोई,

किसी की याद का जिससे कबूतर झांकता है.

उसे दिखतीं हैं चारों ही तरफ़ लाशें ही लाशें ,

कभी ख़ुद में ही जब कोई सितमगर झांकता है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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पेश है एक और ताज़ातरीन ग़ज़ल———

आये जो आप घर मेरे मौसम बदल गया,

यह देख दुश्मनों का जनाजा निकल गया।

जो शक़ की निगाहों से मुझे देखते रहे,

उनको मेरे ही सामने कोई कुचल गया।

ग़ैरों की ख़ुशी देख के सदमें में जो रहा,

बेवक़्त मर के आख़िरस दुनिया से कल गया।

शोहरत भी उसके हाथ में आकर चली गई,

हाथी किसी ढलान से गोया फिसल गया।

सूरज भी था शबाब पर जलता रहा बदन,

ऐसी लगी वो आग नगर सारा जल गया।

उस ज़लज़ले के बाद का मंज़र तो देखिये,

सहरा जो जल रहा था कल दरिया में ढल गया।

चाहा न जिसको प्यार से मैंने कभी ” राही “

उस नाज़नीं को देख के दिल क्यों फिसल गया।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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मेरी कलम से एक ग़ज़ल जिंदगी की…….

खुशी के बुलबुले हैं कुछ, गमों का बोलबाला है

हँसी के हौसलों ने आज तक हमको सम्हाला है

कई उम्मीद के बादल यहाँ छा कर नहीं बरसे

जमीं सब आस की प्यासी पड़ा सूखे से पाला है

बहुत मजबूर है ईमान अब सुनता नहीं कोई

खड़ा है सच सरे महफ़िल मगर होठो पे ताला है

नहीं कोई बचा अबतक खुदा की उस अदालत से

खरा इंसाफ है उसका तरीका भी निराला है

करम के साथ ही अंजाम है नेकी बदी का भी

इसी दिल मे खुदा का घर यही मंदिर शिवाला है

हरिशंकर पाण्डेय

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पेश है एक नाज़ुक ग़ज़ल—

“”””””””””””””””””””””””””””””””””

सुनो आज वादा निभाने का दिन है,

नई शाख पे गुल खिलाने का दिन है।

शब-ए-वस्ल में यूँ न शर्माओ जानम,

ये दिल खोलकर गुदगुदाने का दिन है।

जवां जोश में पाँव फिसले हों शायद,

उसे आज अब भूल जाने का दिन है।

जो ग़ज़लें क़िताबों में हैं क़ैद अब तक,

उन्है बज़्म में गुनगुनाने का दिन है।।

मोहब्बत के गौहर जो पाये हैं हमने,

उन्हें अपने दिल में छुपाने का दिन है।

मुकम्मल है कितनी मोहब्बत ये अपनी,

इसे आज ही आज़माने का दिन है।।

जहाँ तुम मिले थे डगर में अकेले,

वहीं”राही”घर इक बनाने का दिन है।

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078,9893502414

💐💐💐💐💐ग़ज़ल💐💐💐💐💐

गीत के सुर को सजा दे , साज ऐसा चाहिए

दिल तलक पहुँचे सदा अल्फ़ाज़ ऐसा चाहिए

कुछ छिपायें कुछ बतायें, फितरतें इंसान की

जब खुले खुशियाँ बिखेरे , “राज ” ऐसा चाहिए

राह खुद अपनी बनाये फिर सजाकर मंज़िलें

रुख हवा का मोड़ दे ‘अंदाज़’ ऐसा चाहिए

जीत ले हर एक बाज़ी हौसले के जोर से

नाज़ हो अंजाम को, “आगाज़” ऐसा चाहिए

जो हटे पीछे कभी ना, जंग में डटकर लड़े

वीरता भी हो फिदा , “ज़ांबाज ” ऐसा चाहिए

हरिशंकर पाण्डेय

**************ग़ज़ल*************

गम के साये से घिरे दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी हर वफा का मैं सिला न दे पाया

मेरे ही दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !!

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे बैठे हैं,

छलक जायें न कहीं , सामने आऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल भी नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!!

मैंने सोचा था, बहुत दूर चला जाऊँ पर,

तुम न भूलोगी मुझे, मै भी भूलाऊँ कैसे!!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल——

“”””””””””””””””””””””””

ये चिलमन में चेहरा छुपाओ न ऐसे,

मिरे दिल की धड़कन बढ़ाओ न ऐसे।

तुम्हें भर नज़र देखना चाहता हूँ,

नज़र फेरकर अब सताओ न ऐसे।

यही मेरी चाहत है दिल में रहो तुम,

किसी और से दिल लगाओ न ऐसे।

जो उल्फ़त के दीपक जलाये थे मैंने,

हवा दे के उसको बुझाओ न ऐसे।।

सफ़र है कठिन दूर मंज़िल है अपनी,

सरे राह काँटे। बिछाओ न ऐसे।।

बहुत आज़माया है लोगों ने मुझको,

मुझे और तुम आज़माओ न ऐसे।।

मोहब्बत अगर तुमको मुझसे है “राही”

तो बाहें झटक करके जाओ न ऐसे।।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

*************************************”

एक ग़ज़ल

“ये ज़मीं और आस्माँ हूँ मैं,

बेख़बर हूँ मगर कहाँ हूँ मैं ।

जिनमें हर सू उजाले रहते हैं,

उन अँधेरों का कारवाँ हूँ मैं ।

जिसमें कुछ वक़्त ही फ़क़त ठहरा,

भूला-बिसरा वो आशियाँ हूँ मैं ।

मुझसे क्यों दूर-दूर रहती है,

ज़िन्दगी तेरी दास्ताँ हूँ मैं ।

वक़्त से चोट खाए ज़ख़्मों का,

मुस्कराता हुआ निशाँ हूँ gb मैं ।

इक जगह होता गर बता देता,

कौन जाने कहाँ-कहाँ हूँ मैं ।

ज़ीस्त की क़ैद में ‘असर’ सिमटा,

सिर्फ़ उठता हुआ धुआँ हूँ मैं ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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नई गज़ल

यही सवाल अब …. उलझा, मेरे फसाने मे l

कम थी उल्फत..क्या मेरे दिल के आशियाने में !

गर खता थी कुछ हमारी तो बस बता देते ,

हम तो माहिर हैं, किसी भी तरह मनाने में ..!

उनकी यादें भी वफादार हैं , बसी दिल में,

कौन कहता है , वफ़ा है नहीं ज़माने में !

अब तो तूफान का भी खौफ नहीं है मुझको ,

दिये बुझा कर मैं बैठा गरीबखाने में ….

तुम्हारी रूठने की यह अदा बड़ी कातिल,

क्या मिलेगा तुम्हे ऐसे हमें सताने में ..

मगर यकीन है, दावा है, अपनी चाहत पर,

तुम्हारे हाँथ बढेंगे , दिये जलाने में ….

हरिशंकर पाण्डेय

—-–———————————————–

नई ग़ज़ल

मिलेगा मर्तबा , हस्ती को बचाये रखना !

सफर के वास्ते, कश्ती को सजाये रखना !

कहीं तूफाँ तुम्हारा रास्ता क्या रोकेगा ,

अपनी यारी यूँ समुन्दर से बनाये रखना !

जतन से ध्यान से रिश्तों को सम्हाले रखना,

गुलों से प्यार के गुलशन को सजाये रखना!

बड़ी है अहमियत , किरदार की यकीं मानो,

बड़ा अजीज है , हर वक़्त निभाये रखना !

हुनर सफर में बुलंदी तलाश ले फिर भी ,

रहे गरूर ना नजरों को झुकाये रखना !

भले हो सामना हर बार इम्तिहाँ से सुनो ,

अपनी तालीम को जेहन में बसाये रखना !

वतन की मिट्टी के अनमोल नगीने बनकर ,

इसकी तहजीब और शोहरत को उठाये रखना !

हरिशंकर पाण्डेय

********************************

ग़ज़ल संग्रह “चले भी आओ”से एक ग़ज़ल—

“””””””””””””””””””””””””””””””

तुम्हारा शर्म से नज़रें झुकाना याद है हमको,

वो दिलकश प्यार के नग़में सुनाना याद है हमको।

तुम्हारी जिन अदाओं ने हमें शायर बनाया है,

मुसल्सल हर अदा वो क़ातिलाना याद है हमको।

कली से फूल बनकर तुमने जब अंगड़ाइयाँ ली थी,

घटा में बिजलियों का कौंध जाना याद है हमको।

झलक पाकर तुम्हारी खिल उठे जब फूल सहरा में,

परिंदों का मिलन के गीत गाना याद है हमको।।।

तुम्हारा ज़ुल्फ़ लहराना वो दिन में रात हो जाना,

सितारों का फ़लक़ पे झिलमिलाना याद है हमको।

मज़ा आया तुम्हारे गेसुओं से जब हुई बारिश,

उन्हीं रिमझिम फुहारों में नहाना याद है हमको।

खिला चेहरा तुम्हारा देखकर उस चाँद का “राही”

दुबक कर बादलों में मुँह छुपाना याद है हमको।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078, 9893502414

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**ग़ज़ल**

गम के साये से घिरे, दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी ही वफा वाजिब , कसूर मेरा था ,

अपने इस दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे हैं जाकर ,

छलक जायें न कहीं , सामने जाऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल यूँ ,नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

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—————- एक ग़ज़ल————

दफ़अतन दर्द-ए-जिगर कोई बढ़ाकर चल दिया,

बिन धुआँ बिन आग के तनमन जलाकर चल दिया।

कुछ ग़लत करते जो चारागर को पकड़ी भीड़ ने,

शर्म से वो कुछ न बोला सर झुकाकर चल दिया।

मुल्क के नामी अदीबों से सजी उस बज़्म में,

एक बच्चा आईना सबको दिखाकर चल दिया।

वो फ़रिश्ता, रौशनी जिसने न देखी थी कभी,

जाते-जाते नूर की दौलत लुटाकर चल दिया।

मैंने इक शम्मा जलाई थी अमन के वास्ते,

अम्न का दुश्मन कोई आया बुझाकर चल दिया।

है जो जन्नत सरज़मीं का वादी-ए-कश्मीर है,

कौन उसमें आग नफ़रत की लगाकर चल दिया।

जब भरी हुंकार “राही” भारती के लाल ने,

जानी दुश्मन सरहदों से तिलमिलाकर चल दिया।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078,9893502414

***********************************”

फासला दरमियाँ रखा ही नहीं,

यार फिर भी हमें मिला ही नहीं.

एक बच्चा है मुझमें ऐसा भी,

उम्र भर जो कभी हंसा ही नहीं.

इन दरख्तों के झुलसे जिस्मों पर,

अबके मौसम ने कुछ लिखा ही नहीं.

प्यासे कूए ने नेकियों से कहा,

नेकियों का सिला मिला ही नहीं.

मेरी ग़ज़लें तो माँ के जैसी हैं,

जिनके होठों पे बददुआ ही नहीं.

एक लम्हा भी चैन से न कटा,

उम्र कैसे कटी पता ही नहीं.

उस से बिछड़ा नहीं घड़ी भर भी ,

उम्र भर जो मेरा हुआ ही नहीं.

उसकी ग़ज़लों का ऐसा शेर हूँ मैं,

जो मुक्कमल कभी हुआ ही नहीं.

मुक़म्मल =पूरा

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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—-ग़ज़ल—

मुझे ज़िंदगी रास आई न तुम बिन,

गुलों की ये ख़ुशबू भी भाई न तुम बिन।

धरा तप रही थी बदन जल रहा था,

ये सावन की रिमझिम सुहाई न तुम बिन।

कई साल गुज़रे हैं तन्हाईयों में,

कभी कोई महफ़िल सजाई न तुम बिन।

कमाई की राहें बहुत थीं नज़र में,

मगर कोई जोखिम उठाई न तुम बिन।

जगाई थी जो रूह में प्यास तुमने,

किसी ने भी उसको बुझाई न तुम बिन।

किसी ने भी मंदिर का खोला न ताला,

किसी ने भी शम्मा जलाई न तुम बिन।

बहुत हैं यहाँ चाहने वाले “राही”,

किसी को मेरी याद आई न तुम बिन।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक नज़्म ( कविता )

☆कहर इक तूफान का, कैसी तबाही दे गया☆

कहर इक तूफान का, कैसी “तबाही” दे गया I

आशियाना हर “परिन्दे” का उड़ा कर ले गया

जड़ से उखड़े कुछ दरख्तों का मिटा नामोनिशां ,

अब फिज़ा वीरान लगती , दर्द कैसा दे गया !

काल की आँधी थी वो उसने किया बर्बाद सब,

मौत का तांडव मचाकर पीर भारी दे गया।

जिनके अपने थे गए अब लौटना मुमकिन नहीं,

अश्क़ का सैलाब देकर सारी खुशियाँ ले गया।

अब तो कलियों और फूलों की महक फीकी हुई ,

सब तितलियों में उदाशी, जोश गुलशन से गया !

इक हवा के तेज झोंके से सहम जाते हैं अब,

खूब ज़ालिम था वो तूफां, खौफ दिल में दे गया !

सरजमी पर लौट आये सब कहाँ रुकते भला

अब परिन्दों को बनाना है नया इक आशियाँ !

हरिशंकर पाण्डेय-हरिशंकर-9967690881

hppandey59@gmail.com

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एक ताज़ा ग़ज़ल——————-

आज़माना चाहते हो आज़माकर देख लो,

मैं संभलता ही रहूँगा तुम गिराकर देख लो।

मैं तसव्वुर से तुम्हारे जा न पाउँगा कभी,

कोशिशें कर लो मुसल्सल औ भुलाकर देख लो।

टूट जाऊँ मैं ज़रा सी बात पर मुम्किन नही,

हो यकीं तुमको न,घर मेरा जलाकर देख लो।

पायलें छम छम करेंगी जब पढूँगा मैं ग़ज़ल,

चाँदनी शब में सनम महफ़िल सजाकर देख लो।

तुम अकेले रह न पाओगे ये दावा है मेरा,

कुछ दिनों को घर अलग अपना बसाकर देख लो।

चाँद धरती पर उतर आयेगा काली रात में,

तुम ज़रा चेहरे से ये चिलमन हटाकर देख लो।

आग लग जायेगी पानी में है “राही” को यकीं,

आज बेपर्दा नदी में तुम नहा कर देख लो।।

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प्यार करोगे प्यार मिलेगा,

अपनों का संसार मिलेगा ।

दिल से फ़र्ज़ निभाओगे जब,

जो चाहो अधिकार मिलेगा।।

जब अवाम का काम करोगे,

फूलों का तब हार मिलेगा।।

सोच लूट की छोड़ो वार्ना,

हर रस्ते पर खार मिलेगा।

चाल ढाल बदलो ख़ुद अपनी,

तभी तुम्हें दिलदार मिलेगा।।

जिसे खोजते हो बरसों से,

वो दरिया के पार मिलेगा।

महफ़िल तभी सजेगी “राही”

जब कोई फ़नकार मिलेगा।

“राही” भोजपुरी , जबलपुर मध्य प्रदेश ।

07987949078, 09893502414

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एक ग़ज़ल श्री अनिल कुमार राही की कलम से

ज़रा-सी बात पर हो तुम ख़फा अच्छा नहीं लगता।

जुदा होकर रहे फिर गमज़दा अच्छा नहीं लगता।।

बहारें चूमती दामन न जाओ छोड़कर मुझको।

तुम्हारे बिन कोई मौसम जरा अच्छा नहीं लगता।।

हुए मशहूर हम इतने ज़माने की नज़र हम पर।

तुम्हे कोई कहे अब बेवफा अच्छा नहीं लगता।।

खुदाया रूठ जाये तो कसम रब की करूँ सजदा।

जुनूने इश़क में ये आसरा अच्छा नहीं लगता।।

मुहब्बत पर भरोसा कर लिए हैं आँख में आँसू।

बगावत का सलीका यूँ डरा अच्छा नहीं लगता।।

जुड़ी है हर खुशी तुमसे हकीक़त यह खुदा जाने।

नुमाॅया हो वफ़ा यह फलसफा अच्छा नहीं लगता।।

तुम्हारा साथ था राही खुदाई साथ थी अपने।

मगर अब प्यार का वो तज़किरा अच्छा नहीं लगता।।

(अनिल कुमार राही)ग़ज़ल की दुनिया

दोस्तों,ग़ज़ल को पढ़ने या सुनने से दिल को बड़ा सुकून मिलता है।

दोस्तों इस पोस्ट में आपको मेरी गज़लों के साथ-साथ अच्छे गजलकारों की गजलें भी पढ़ने को मिलेगी। मैं आशा करता हूं यह गजलें आपको बहुत पसंद आएंगी।

ग़ज़ल की दुनिया की शुरुआत मैं अपने एक शेर के साथ कर रहा हूं। पेश-ए-ख़िदमत है—

पीर जब दिल से निकल कर शायरी में आयेगी

एक संजीदा ग़ज़ल तहरीर में ढल जायेगी

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ग़ज़ल का अंदाज

लुटे ख़्वाबों की पनाहों में ग़ज़ल होती है,

किए वादों के गुनाहों में ग़ज़ल होती है।

मिटें जो मुल्क में चैनो-अमन लाने के लिए,

उनकी हसरत भरी आहों में ग़ज़ल होती है।

निकल पड़े जो सच की राह पर सभी के लिए,

उनकी गैरत भरी राहों में ग़ज़ल होती है।

खुशी देकर जो सभी को खुशी से झूम उठें,

उनकी पुरआब निगाहों में ग़ज़ल होती है।

वो जिन्हें इश्क़ में ख़ुदा के अक़्श जैसा दिखे,

उनकी फैली हुई बाहों में ग़ज़ल होती है।

हुक़्मराँ ने किया आवाम को तबाह जहाँ,

वहाँ हर शख़्स की आहों में ग़ज़ल होती है।

उठे आवाज़ अगर सबकी बेहतरी के लिए,

तो उसकी नेक सलाहों में ग़ज़ल होती है।

Gopal S Singh

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एक खूबसूरत ग़ज़ल — दिल का टूटा हुआ आईना रह गया

दिल का टूटा हुआ… आईना रह गया,

ख़त मुकम्मल लिखा,बस पता रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

फेर कर के नजर..,रास्ते चल पडे,

वो फसाना वहीं पर थमा रह गया

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यादें दफना दीं सारी उसी घाट पर,

मेरे भीतर कहीं तू बचा रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

बातें होती रहीं ….आपसे रात भर,

दर्द दिल का मगर अनकहा रह गया

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

दुश्मनी थी उजालों को उस रात से,

ख्वाब आँखों में आके रुका रह गया,

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

जिस्म से रूह जैसा रहा साथ जब,

बीच में कैसे ये फासला रह गया,

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

है कयामत से बढ के सजा”मीरा”की,

और बाकी मेरे क्या ख़ुदा रह गया,

©कश्मीरा त्रिपाठी

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एक रूहानी ग़ज़ल——————-

कभी मेरे नज़दीक आकर तो देखो

मोहब्बत की शम्मा जलाकर तो देखो

महक जायेंगी आसमां तक हवायें

ये आँचल हवा में उड़ाकर तो देखो

न जी पाओगे चैन से एक शब भी

मुझे अपने दिल से भुलाकर तो देखो

निगाहों से मेरी नहीं बच सकोगे

कोई बात मुझसे छुपाकर तो देखो

संवर जायेगा ज़िंदगी का गुलिस्तां

किसी को भी अपना बनाकर तो देखो

न हो गर यकीं प्यार पे मेरे तुमको

बुरे वक़्त पे आज़माकर तो देखो

यक़ीनन सुकूँ चैन “राही” मिलेगा

मुझे प्यार से तुम मनाकर तो देखो

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक प्यारी ताज़ातरीन ग़ज़ल

हेलो,

ज़िन्दगी…

जिससे मिलने में हमको ज़माने लगे,

मिलते ही वो हमें आज़माने लगे ।

मुद्दतों बाद सच याद आया बहुत,

झूठ के जब ठिकाने ठिकाने लगे ।

जब भी ख़ामोशियों से मुलाकात की,

कुछ परिंदे वहाँ चहचहाने लगे ।

नींद भी उड़ गई चैन भी उड़ गया,

ख़ुद से क्या हम बहाने बनाने लगे ।

बारहा आईना देखना शौक था,

उम्र ढलते ही नज़रें चुराने लगे ।

बंद वीरान घर खोलते ही हमें,

गुज़रे पल पास अपने बुलाने लगे ।

सोचता हूँ अंधेरों में घर के शजर,

क्यौं हमें देखकर जगमगाने लगे ।

यादों ने फिर रुलाया हमें यूँ ‘असर’,

रोते-रोते ही हम मुस्कराने लगे ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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ताज़ातरीन गजल

सोच लेगा तू तो मैं तेरी रज़ा हो जाऊंगा.

मैं फकीरों की दुआ का सिलसिला हो जाऊंगा .

इक दफा कह दे कि तू है हान्सिले मंज़िल मेरी,

जिस्म से मैं रूह तक का रास्ता हो जाऊँगा.

बारगाहे इश्क की खुशबू हूँ मैं ,महसूस कर,

गर मुझे छूने कि ज़िद की तो हवा हो जाऊंगा.

जिस ग़ज़ल में तू मुसलसल बन के आयेगा रदीफ़ ,

उस गज़ल का मैं मुक्कमल काफ़िया हो जाऊंगा.

सूफ़ीयाना इश्क में है दिल फ़कीराना मेरा,

तुझमें शामिल अब किसी दिन शर्तिया हो जाऊंगा.

साँस गर लेती रही ,सांसों में मेरे बेखुदी ,

मैं फ़कीरों की मजारों का दिया हो जाऊंगा.

नूर तेरा आ रहा है मेरे चेहरे पे नज़र ,

इस से ज़्यादा अब खुदा मैं और क्या हो जाऊंगा.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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सुमन ढींगरा दुग्गल जी की कलम से—-

एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

कब कहाँ किस को दग़ा दे जानता कोई नहीं

ज़िंदगी सा बेमुरव्वत। बेवफा कोई नहीं

दिल कहीं पत्थर न हो जाए बस इतना याद रख

ये वो पत्थर है कि जिसको पूजता कोई नहीं

बेअसर हैं तेरी आहें उस पे तो हैरत न कर

पत्थरों का फूल से क्या वास्ता, कोई नहीं

भूल तो हर शख़्स से मुमकिन है हम हों आप हों

क्यूँ कि हम सब आदमी हैं देवता कोई नहीं

नफ़्सी नफ़्सी हर तरफ है कौन किस का है यहाँ

ए ख़ुदा तेरे सिवा अब आसरा कोई नहीं

बेखुदी का राज़ बतलाते हैं तुम को आज हम

हम ने उस को पा लिया जिस का पता कोई नहीं

दूर रहता है निगाहों से मेरी फिर भी ‘सुमन’

ज़हन ओ दिल में वो ही वो है दूसरा कोई नहीं

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माॅ॑

जहाॅ॑ माॅ॑ की दुआएॅ॑ हैं वहाॅ॑ डर हो नहीं सकता

ख़ुदा तो है ख़ुदा,माॅ॑ के बराबर हो नहीं सकता

नहीं मालूम हो रस्ता सफर का और मंज़िल भी

भले हो क़ाफ़ला-सालार, रहबर हो नहीं सकता

रहे ,बस रह लिये ता-उम्र यूॅ॑ ही कुछ मकानों में

मुहब्बत के बिना कोई मकाॅ॑,घर हो नहीं सकता

चलो, इस उम्र में अब आइने से दोस्ती छोड़ें

जवानी के दिनों में था जो मंज़र हो नहीं सकता

हमारी ज़िन्दगी हमको हमेशा ये सिखाती है

मिलें मजलूम की आहें,सिकंदर हो नहीं सकता

जिसे माॅ॑-बाप की अपने दुआ हासिल नहीं होती

किसी औलाद को रुतबा मयस्सर हो नहीं सकता

हवेली हो शहर में और सब सामान, सुविधाएॅ॑

मगर ये गाॅ॑व के घर के बराबर हो नहीं सकता

किशन स्वरूप

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पेश है एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————-

आग दिल में है लगी इसको बुझायें कैसे,

जिससे उम्मीद थी रूठा है मनायें कैसे।।

हम दुखी होते हैं तो रोती हैं आँखें उसकी,

ऐसे हमदर्द को बोलो तो भुलायें कैसे।।।।

ये तो सच है कि वो हमको ही चाहता है फक़त,

वो मगर दूर है फिर प्यार जतायें कैसे।।।।

बाद मुद्दत के सजाई है प्यार की महफ़िल,

ज़िद्दी तूफ़ान में अब शम्मा जलायें कैसे।।

एक अर्से से हमें नींद नहीं आई है,

कोई बतलाये उसे ख़्वाब में लायें कैसे।

है नदी पार की बस्ती में बसेरा उसका,

कोई जरिया नहीं जाने का तो जायें कैसे।

अब उसे हम पे भरोसा ही नहीं है “राही”

उससे अब दिल की कोई बात बतायें कैसे।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक संज़ीदा ग़ज़ल

आज दरिया चली ख़ुद लहर ढूढ़ने,

तल्खियों में बसा खुश शहर ढूढ़ने।

आज आबो – हवा है निराली बहुत,

जिन्दगी जब चली खुद ज़हर ढूढ़ने।

सब मसीहा अमन के बने फिर रहे,

है चला जब अमन ख़ुद बशर ढूढने।

ख़्वाब पाले, बढ़े तिस्नग़ी से सजे,

रूह को दे सुकूँ वो दहर ढूढ़ने।

दौर है बे-अदब शानो-शौक़त का ये,

सादगी में चले सब कहर ढूढ़ने।

आदमी,आदमी के गले मिल रहा,

“अपने काटे का ज़िन्दा असर”ढूढ़ने।

तोड़ती साँस अब सादगी कह रही,

दफ़्न हो मैं चली खुश-ज़िगर ढूढ़ने।

Gopal S Singh

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ग़ज़ल

जब उठी आवाज मुफ़्लिश की वो दबवाई गयी ।

हर दफा झूठी फ़क़त तस्बीर दिखलाई गयी ।

मुश्किलें आसान हैं दौलत के दम पर इस कदर

जेब है भारी उसे हर चीज दिलवायी गयी ।

पिस रही है अब गरीबी कुछ सियाशी पाट में

मज़हबी, क़ौमी सवालों में ये उलझाई गयी।

एक चिनगारी जो भड़की आग बढ़ती ही गयी

हुक्मरानों तक बजा फ़रियाद पहुँचाई गयी।

सूरतें बदलें ‘सुमित’ तब तो बने कुछ बात भी

अब तलक वादों की बस आवाज सुनवाई गयी।

हरिशंकर पाण्डेय ‘सुमित’

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल

जनाज़ा किसी का उठा ही नहीं है,

मरा कौन मुझमें पता ही नहीं है.

मुझे खो दिया और लगा उसको ऐसा,

कि जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं है.

ये कैसी इबादत ये कैसी नमाज़ें,

ज़ुबां पर किसी के दुआ ही नहीं है.

चले जिस्म से रूह तक तो लगा ये,

बिछुड़ वो गया जो मिला ही नहीं है.

यूँ कहने को हम घर से चल तो दिए हैं,

मगर जिस तरफ़ रास्ता ही नहीं है.

ख़ताओं की वो भी सज़ा दे रहे हैं,

गुनाहों के जिनकी सज़ा ही नहीं है.

पसीने से मैं अपने वो लिख रहा हूँ,

जो क़िस्मत में मेरे लिखा ही नहीं है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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मनोज राठोर ‘मनुज’ जी की कलम से…..

कह दो वफ़ा कुबूल है क्यों कश्मकश में हो

बाकी तो सब फिजूल है क्यों कश्मकश में हो

जिस पर तुम्हें गुरुर तुम्हारा बदन नहीं

यह तो जमीं की धूल है क्यों कशमकश में हो

मिलता उसे ही कुछ है जो खोता है कुछ यहां

जग का यही उसूल है क्यों कशमकश में हो

उजड़े हुए चमन से जो खुशबू सी आ रही

जिंदा कोई तो फूल है क्यों कशमकश में हो

दे दो सजा या छोड़ दो उल्फ़त तो की मनुज

इतनी सी अपनी भूल है क्यों कशमकश में हो

मनोज राठौर मनुज

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल आपके हवाले———

ख़ुद किसी की याद में दिल को जलाकर देखिये,

और फिर उसके लिये जग को भुलाकर देखिये।

पुरसुकूं दिल को मिलेगा काम ये जो कर दिये,

रो रहा बच्चा कोई उसको हँसाकर देखिये।।।

उनकी शोहबत में मिलेगी आप को शोहरत ज़रूर,

बस किसी महफ़िल में उनको तो बुलाकर देखिये।

राह-ए-उल्फ़त में फक़त गुल ही नहीं काँटे भी हैं,

आज़माना हो,किसी से दिल लगाकर देखिये।।

आप को भी चाहने वाले मिलेंगे बेशुमार,

बस किसी के दर्द में आँसू बहाकर देखिये।

दूर रहकर दिलरुबा से चैन किसको है मिला,

है नहीं गर चे यकीं बस आज़माकर देखिये।

प्यार करने का अगर करते हैं दावा आप तो,

लाख मुश्किल हो तो क्या फिर भी निभाकर देखिये।

आप का ही तज़किरा होगा शहर में तरफ़,

इक किसी मज़लूम को अपना बनाकर देखिये।

उम्र भर “राही” दवावों से रहेंगे दूर आप,

सादगी से ज़िन्दगी अपनी बिताकर देखिये।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————

ये दुनिया मुझे आज़माने लगी है,

बुलंदी से नीचे गिराने लगी है।

कभी टूट कर प्यार मुझसे किया था,

मगर क्यों वो अब दूर जाने लगी है।।

खुले दिल से मिलते रहे थे मगर, वो,

कई राज़ दिल के छुपाने लगी है।।।।

नहीं देख पाती थी जो मेरे आँसू,

वो हर पल मुझे अब रुलाने लगी है।

लिपट कर जो साये से रहती थी हरदम,

वो मिलने से नज़रें चुराने लगी है।।

जिसे तीरगी रास आती नहीं थी,

चराग़ों को क्यों अब बुझाने लगी है।

बहुत साफ थे पैरहन जिसके “राही”

वो दामन में काँटे उगाने लगी है।।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414 ।

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एक नई ग़ज़ल सूफी सुरेश चतुर्वेदी जी

की कलम से

मेरी गहराई में बन कर समंदर झांकता है,

न जाने कौन है जो मेरे अन्दर झांकता है.

ख़ुद अपने आप से डर कर सिमट जाता है ख़ुद में,

किसी भी आईने में जब भी पत्थर झांकता है.

बदन में कर्बला बन कर कोई लेता है साँसें ,

लहू में जब कहीं भी प्यासा ख़जर झांकता है.

रहा करते हैं दोनों साथ और दोनों हैं ख़ाली,

यही बस सोच कर मुझमें मेरा घर झांकता है.

मुझे बचपन से माँ कहती रही है जाने क्यूँ ये ,

मेरी ऐडी से से इक छोटा सा नश्तर झांकता है.[नश्तर=कांटा]

मेरे दिल में यक़ीनन ही है रोशनदान कोई,

किसी की याद का जिससे कबूतर झांकता है.

उसे दिखतीं हैं चारों ही तरफ़ लाशें ही लाशें ,

कभी ख़ुद में ही जब कोई सितमगर झांकता है.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

मेरे लाइक पेज को देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें,

https://www.facebook.com/pages/Surendra-Chaturvedi/1432812456952945?ref=hl

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पेश है एक और ताज़ातरीन ग़ज़ल———

आये जो आप घर मेरे मौसम बदल गया,

यह देख दुश्मनों का जनाजा निकल गया।

जो शक़ की निगाहों से मुझे देखते रहे,

उनको मेरे ही सामने कोई कुचल गया।

ग़ैरों की ख़ुशी देख के सदमें में जो रहा,

बेवक़्त मर के आख़िरस दुनिया से कल गया।

शोहरत भी उसके हाथ में आकर चली गई,

हाथी किसी ढलान से गोया फिसल गया।

सूरज भी था शबाब पर जलता रहा बदन,

ऐसी लगी वो आग नगर सारा जल गया।

उस ज़लज़ले के बाद का मंज़र तो देखिये,

सहरा जो जल रहा था कल दरिया में ढल गया।

चाहा न जिसको प्यार से मैंने कभी ” राही “

उस नाज़नीं को देख के दिल क्यों फिसल गया।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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मेरी कलम से एक ग़ज़ल जिंदगी की…….

खुशी के बुलबुले हैं कुछ, गमों का बोलबाला है

हँसी के हौसलों ने आज तक हमको सम्हाला है

कई उम्मीद के बादल यहाँ छा कर नहीं बरसे

जमीं सब आस की प्यासी पड़ा सूखे से पाला है

बहुत मजबूर है ईमान अब सुनता नहीं कोई

खड़ा है सच सरे महफ़िल मगर होठो पे ताला है

नहीं कोई बचा अबतक खुदा की उस अदालत से

खरा इंसाफ है उसका तरीका भी निराला है

करम के साथ ही अंजाम है नेकी बदी का भी

इसी दिल मे खुदा का घर यही मंदिर शिवाला है

हरिशंकर पाण्डेय

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पेश है एक नाज़ुक ग़ज़ल—

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सुनो आज वादा निभाने का दिन है,

नई शाख पे गुल खिलाने का दिन है।

शब-ए-वस्ल में यूँ न शर्माओ जानम,

ये दिल खोलकर गुदगुदाने का दिन है।

जवां जोश में पाँव फिसले हों शायद,

उसे आज अब भूल जाने का दिन है।

जो ग़ज़लें क़िताबों में हैं क़ैद अब तक,

उन्है बज़्म में गुनगुनाने का दिन है।।

मोहब्बत के गौहर जो पाये हैं हमने,

उन्हें अपने दिल में छुपाने का दिन है।

मुकम्मल है कितनी मोहब्बत ये अपनी,

इसे आज ही आज़माने का दिन है।।

जहाँ तुम मिले थे डगर में अकेले,

वहीं”राही”घर इक बनाने का दिन है।

“राही” भोजपुरी,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078,9893502414

💐💐💐💐💐ग़ज़ल💐💐💐💐💐

गीत के सुर को सजा दे , साज ऐसा चाहिए

दिल तलक पहुँचे सदा अल्फ़ाज़ ऐसा चाहिए

कुछ छिपायें कुछ बतायें, फितरतें इंसान की

जब खुले खुशियाँ बिखेरे , “राज ” ऐसा चाहिए

राह खुद अपनी बनाये फिर सजाकर मंज़िलें

रुख हवा का मोड़ दे ‘अंदाज़’ ऐसा चाहिए

जीत ले हर एक बाज़ी हौसले के जोर से

नाज़ हो अंजाम को, “आगाज़” ऐसा चाहिए

जो हटे पीछे कभी ना, जंग में डटकर लड़े

वीरता भी हो फिदा , “ज़ांबाज ” ऐसा चाहिए

हरिशंकर पाण्डेय

**************ग़ज़ल*************

गम के साये से घिरे दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी हर वफा का मैं सिला न दे पाया

मेरे ही दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !!

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे बैठे हैं,

छलक जायें न कहीं , सामने आऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल भी नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!!

मैंने सोचा था, बहुत दूर चला जाऊँ पर,

तुम न भूलोगी मुझे, मै भी भूलाऊँ कैसे!!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

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एक ताज़ातरीन ग़ज़ल——

“”””””””””””””””””””””””

ये चिलमन में चेहरा छुपाओ न ऐसे,

मिरे दिल की धड़कन बढ़ाओ न ऐसे।

तुम्हें भर नज़र देखना चाहता हूँ,

नज़र फेरकर अब सताओ न ऐसे।

यही मेरी चाहत है दिल में रहो तुम,

किसी और से दिल लगाओ न ऐसे।

जो उल्फ़त के दीपक जलाये थे मैंने,

हवा दे के उसको बुझाओ न ऐसे।।

सफ़र है कठिन दूर मंज़िल है अपनी,

सरे राह काँटे। बिछाओ न ऐसे।।

बहुत आज़माया है लोगों ने मुझको,

मुझे और तुम आज़माओ न ऐसे।।

मोहब्बत अगर तुमको मुझसे है “राही”

तो बाहें झटक करके जाओ न ऐसे।।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

*************************************”

एक ग़ज़ल

“ये ज़मीं और आस्माँ हूँ मैं,

बेख़बर हूँ मगर कहाँ हूँ मैं ।

जिनमें हर सू उजाले रहते हैं,

उन अँधेरों का कारवाँ हूँ मैं ।

जिसमें कुछ वक़्त ही फ़क़त ठहरा,

भूला-बिसरा वो आशियाँ हूँ मैं ।

मुझसे क्यों दूर-दूर रहती है,

ज़िन्दगी तेरी दास्ताँ हूँ मैं ।

वक़्त से चोट खाए ज़ख़्मों का,

मुस्कराता हुआ निशाँ हूँ gb मैं ।

इक जगह होता गर बता देता,

कौन जाने कहाँ-कहाँ हूँ मैं ।

ज़ीस्त की क़ैद में ‘असर’ सिमटा,

सिर्फ़ उठता हुआ धुआँ हूँ मैं ।”

– सुधीर त्रिपाठी ‘असर’

9935078721

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नई गज़ल

यही सवाल अब …. उलझा, मेरे फसाने मे l

कम थी उल्फत..क्या मेरे दिल के आशियाने में !

गर खता थी कुछ हमारी तो बस बता देते ,

हम तो माहिर हैं, किसी भी तरह मनाने में ..!

उनकी यादें भी वफादार हैं , बसी दिल में,

कौन कहता है , वफ़ा है नहीं ज़माने में !

अब तो तूफान का भी खौफ नहीं है मुझको ,

दिये बुझा कर मैं बैठा गरीबखाने में ….

तुम्हारी रूठने की यह अदा बड़ी कातिल,

क्या मिलेगा तुम्हे ऐसे हमें सताने में ..

मगर यकीन है, दावा है, अपनी चाहत पर,

तुम्हारे हाँथ बढेंगे , दिये जलाने में ….

हरिशंकर पाण्डेय

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नई ग़ज़ल

मिलेगा मर्तबा , हस्ती को बचाये रखना !

सफर के वास्ते, कश्ती को सजाये रखना !

कहीं तूफाँ तुम्हारा रास्ता क्या रोकेगा ,

अपनी यारी यूँ समुन्दर से बनाये रखना !

जतन से ध्यान से रिश्तों को सम्हाले रखना,

गुलों से प्यार के गुलशन को सजाये रखना!

बड़ी है अहमियत , किरदार की यकीं मानो,

बड़ा अजीज है , हर वक़्त निभाये रखना !

हुनर सफर में बुलंदी तलाश ले फिर भी ,

रहे गरूर ना नजरों को झुकाये रखना !

भले हो सामना हर बार इम्तिहाँ से सुनो ,

अपनी तालीम को जेहन में बसाये रखना !

वतन की मिट्टी के अनमोल नगीने बनकर ,

इसकी तहजीब और शोहरत को उठाये रखना !

हरिशंकर पाण्डेय

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ग़ज़ल संग्रह “चले भी आओ”से एक ग़ज़ल—

“””””””””””””””””””””””””””””””

तुम्हारा शर्म से नज़रें झुकाना याद है हमको,

वो दिलकश प्यार के नग़में सुनाना याद है हमको।

तुम्हारी जिन अदाओं ने हमें शायर बनाया है,

मुसल्सल हर अदा वो क़ातिलाना याद है हमको।

कली से फूल बनकर तुमने जब अंगड़ाइयाँ ली थी,

घटा में बिजलियों का कौंध जाना याद है हमको।

झलक पाकर तुम्हारी खिल उठे जब फूल सहरा में,

परिंदों का मिलन के गीत गाना याद है हमको।।।

तुम्हारा ज़ुल्फ़ लहराना वो दिन में रात हो जाना,

सितारों का फ़लक़ पे झिलमिलाना याद है हमको।

मज़ा आया तुम्हारे गेसुओं से जब हुई बारिश,

उन्हीं रिमझिम फुहारों में नहाना याद है हमको।

खिला चेहरा तुम्हारा देखकर उस चाँद का “राही”

दुबक कर बादलों में मुँह छुपाना याद है हमको।

“राही” भोजपुरीं,जबलपुर मध्य प्रदेश

7987949078, 9893502414

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**ग़ज़ल**

गम के साये से घिरे, दर्द छिपाऊँ कैसे!

ज़ख्म सीने में दबा, तुमको रिझाऊँ कैसे!!

तुम्हारी ही वफा वाजिब , कसूर मेरा था ,

अपने इस दर्द से , तुमको मैं मिलाऊँ कैसे !

अश्क़ गमगीन हो पलकों में छिपे हैं जाकर ,

छलक जायें न कहीं , सामने जाऊँ कैसे !

तुम मेरा हाल यूँ ,नज़रों से भाँप लेती हो ,

एक चेहरे पर “नया चेहरा” लगाऊँ कैसे!

ये आरजू है मेरी, राह कुछ निकल आए,

एक खुशियों का चमन आज सजाऊँ कैसे!!

हरिशंकर पाण्डेय

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—————- एक ग़ज़ल————

दफ़अतन दर्द-ए-जिगर कोई बढ़ाकर चल दिया,

बिन धुआँ बिन आग के तनमन जलाकर चल दिया।

कुछ ग़लत करते जो चारागर को पकड़ी भीड़ ने,

शर्म से वो कुछ न बोला सर झुकाकर चल दिया।

मुल्क के नामी अदीबों से सजी उस बज़्म में,

एक बच्चा आईना सबको दिखाकर चल दिया।

वो फ़रिश्ता, रौशनी जिसने न देखी थी कभी,

जाते-जाते नूर की दौलत लुटाकर चल दिया।

मैंने इक शम्मा जलाई थी अमन के वास्ते,

अम्न का दुश्मन कोई आया बुझाकर चल दिया।

है जो जन्नत सरज़मीं का वादी-ए-कश्मीर है,

कौन उसमें आग नफ़रत की लगाकर चल दिया।

जब भरी हुंकार “राही” भारती के लाल ने,

जानी दुश्मन सरहदों से तिलमिलाकर चल दिया।

“राही” भोजपुरी, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078,9893502414

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फासला दरमियाँ रखा ही नहीं,

यार फिर भी हमें मिला ही नहीं.

एक बच्चा है मुझमें ऐसा भी,

उम्र भर जो कभी हंसा ही नहीं.

इन दरख्तों के झुलसे जिस्मों पर,

अबके मौसम ने कुछ लिखा ही नहीं.

प्यासे कूए ने नेकियों से कहा,

नेकियों का सिला मिला ही नहीं.

मेरी ग़ज़लें तो माँ के जैसी हैं,

जिनके होठों पे बददुआ ही नहीं.

एक लम्हा भी चैन से न कटा,

उम्र कैसे कटी पता ही नहीं.

उस से बिछड़ा नहीं घड़ी भर भी ,

उम्र भर जो मेरा हुआ ही नहीं.

उसकी ग़ज़लों का ऐसा शेर हूँ मैं,

जो मुक्कमल कभी हुआ ही नहीं.

मुक़म्मल =पूरा

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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—-ग़ज़ल—

मुझे ज़िंदगी रास आई न तुम बिन,

गुलों की ये ख़ुशबू भी भाई न तुम बिन।

धरा तप रही थी बदन जल रहा था,

ये सावन की रिमझिम सुहाई न तुम बिन।

कई साल गुज़रे हैं तन्हाईयों में,

कभी कोई महफ़िल सजाई न तुम बिन।

कमाई की राहें बहुत थीं नज़र में,

मगर कोई जोखिम उठाई न तुम बिन।

जगाई थी जो रूह में प्यास तुमने,

किसी ने भी उसको बुझाई न तुम बिन।

किसी ने भी मंदिर का खोला न ताला,

किसी ने भी शम्मा जलाई न तुम बिन।

बहुत हैं यहाँ चाहने वाले “राही”,

किसी को मेरी याद आई न तुम बिन।

“राही” भोजपुरीं, जबलपुर मध्य प्रदेश ।

7987949078, 9893502414

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एक नज़्म ( कविता )

☆कहर इक तूफान का, कैसी तबाही दे गया☆

कहर इक तूफान का, कैसी “तबाही” दे गया I

आशियाना हर “परिन्दे” का उड़ा कर ले गया

जड़ से उखड़े कुछ दरख्तों का मिटा नामोनिशां ,

अब फिज़ा वीरान लगती , दर्द कैसा दे गया !

काल की आँधी थी वो उसने किया बर्बाद सब,

मौत का तांडव मचाकर पीर भारी दे गया।

जिनके अपने थे गए अब लौटना मुमकिन नहीं,

अश्क़ का सैलाब देकर सारी खुशियाँ ले गया।

अब तो कलियों और फूलों की महक फीकी हुई ,

सब तितलियों में उदाशी, जोश गुलशन से गया !

इक हवा के तेज झोंके से सहम जाते हैं अब,

खूब ज़ालिम था वो तूफां, खौफ दिल में दे गया !

सरजमी पर लौट आये सब कहाँ रुकते भला

अब परिन्दों को बनाना है नया इक आशियाँ !

हरिशंकर पाण्डेय-हरिशंकर-9967690881

hppandey59@gmail.com

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एक ताज़ा ग़ज़ल——————-

आज़माना चाहते हो आज़माकर देख लो,

मैं संभलता ही रहूँगा तुम गिराकर देख लो।

मैं तसव्वुर से तुम्हारे जा न पाउँगा कभी,

कोशिशें कर लो मुसल्सल औ भुलाकर देख लो।

टूट जाऊँ मैं ज़रा सी बात पर मुम्किन नही,

हो यकीं तुमको न,घर मेरा जलाकर देख लो।

पायलें छम छम करेंगी जब पढूँगा मैं ग़ज़ल,

चाँदनी शब में सनम महफ़िल सजाकर देख लो।

तुम अकेले रह न पाओगे ये दावा है मेरा,

कुछ दिनों को घर अलग अपना बसाकर देख लो।

चाँद धरती पर उतर आयेगा काली रात में,

तुम ज़रा चेहरे से ये चिलमन हटाकर देख लो।

आग लग जायेगी पानी में है “राही” को यकीं,

आज बेपर्दा नदी में तुम नहा कर देख लो।।

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प्यार करोगे प्यार मिलेगा,

अपनों का संसार मिलेगा ।

दिल से फ़र्ज़ निभाओगे जब,

जो चाहो अधिकार मिलेगा।।

जब अवाम का काम करोगे,

फूलों का तब हार मिलेगा।।

सोच लूट की छोड़ो वार्ना,

हर रस्ते पर खार मिलेगा।

चाल ढाल बदलो ख़ुद अपनी,

तभी तुम्हें दिलदार मिलेगा।।

जिसे खोजते हो बरसों से,

वो दरिया के पार मिलेगा।

महफ़िल तभी सजेगी “राही”

जब कोई फ़नकार मिलेगा।

“राही” भोजपुरी , जबलपुर मध्य प्रदेश ।

07987949078, 09893502414

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एक ग़ज़ल श्री अनिल कुमार राही की कलम से

ज़रा-सी बात पर हो तुम ख़फा अच्छा नहीं लगता।

जुदा होकर रहे फिर गमज़दा अच्छा नहीं लगता।।

बहारें चूमती दामन न जाओ छोड़कर मुझको।

तुम्हारे बिन कोई मौसम जरा अच्छा नहीं लगता।।

हुए मशहूर हम इतने ज़माने की नज़र हम पर।

तुम्हे कोई कहे अब बेवफा अच्छा नहीं लगता।।

खुदाया रूठ जाये तो कसम रब की करूँ सजदा।

जुनूने इश़क में ये आसरा अच्छा नहीं लगता।।

मुहब्बत पर भरोसा कर लिए हैं आँख में आँसू।

बगावत का सलीका यूँ डरा अच्छा नहीं लगता।।

जुड़ी है हर खुशी तुमसे हकीक़त यह खुदा जाने।

नुमाॅया हो वफ़ा यह फलसफा अच्छा नहीं लगता।।

तुम्हारा साथ था राही खुदाई साथ थी अपने।

मगर अब प्यार का वो तज़किरा अच्छा नहीं लगता।।

(अनिल कुमार राही)

पेश है एक ताज़ातरीन ग़ज़ल—————-

आग दिल में है लगी इसको बुझायें कैसे,
जिससे उम्मीद थी रूठा है मनायें कैसे।।

हम दुखी होते हैं तो रोती हैं आँखें उसकी,
ऐसे हमदर्द को बोलो तो भुलायें कैसे।।।।

ये तो सच है कि वो हमको ही चाहता है फक़त,
वो मगर दूर है फिर प्यार जतायें कैसे।।।।

बाद मुद्दत के सजाई है प्यार की महफ़िल,
ज़िद्दी तूफ़ान में अब शम्मा जलायें कैसे।।

एक अर्से से हमें नींद नहीं आई है,
कोई बतलाये उसे ख़्वाब में लायें कैसे।

है नदी पार की बस्ती में बसेरा उसका,
कोई जरिया नहीं जाने का तो जायें कैसे।

शेरो शायरी की बहार

दोस्तों,

शायरी पढ़ना, सुनना और लिखना इन तीनो बातों का मज़ा ही कुछ और है। शायरी फ़ारसी,अरबी भाषाओं से होते हए उर्दू भाषा तक पहुँची है।
आपको एक बात बताना मैं जरूरी समझता हूँ कि शायरी पूरी तरह से सिर्फ़ उर्दू भाषा मे ही हो ,यह जरूरी नहीं है। शायरी में हिंदी के भी शब्द मिलाकर भी लिख सकते हैं।। शब्द सही होने चाहिए और शायरी की लय (कहन) सटीक होगी तो दिल मे उतर जाती है। शायरी पढ़ने का शौक तो हिंदी भाषी लोगों को भी बहुत होता है। शायरी का सम्बंध दिल से होता है। देखा जाये तो शायरी दिल से ही लिखी जाती है।

इसीलिए मैने एक शेर लिखा—–

ख़ुशी या ग़म का रिश्ता दिल से होता है बड़ा गहरा
लिखी जाती है उम्दा शायरी दिल की सियाही से

दोस्तों,नीचे एक चार लाइन के मुक्तक का मज़ा लीजिये और इसके बाद शायरी की बहार का आनंद लीजिये।

हमारी ज़िन्दगी में याद की अपनी अहमियत है,
कभी वह इक महकती, खुशनुमा अहसास होती है
सिमटकर कर वह भिगाती है कभी मासूम पलकों को,
नहीं मिटती हमारे मन से, दिल के पास होती है !!

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

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अलग अलग रंग के शेर–मेरी कलम से.

और पढ़ें
फूलों से ज़ख्म

किसी काँटे से कभी खौफ़ नहीं खाये हम
ज़ख्म फूलों ने दिये भूल नहीं पाये हम

उनके रुख़ पर जो मेरे दर्द से खुशी देखी
इस हक़ीक़त -ए- जिंदगी को जान पाए हम

गर्दिश -ए -जिंदगी ने ही बदल दिया मुझको
यार कहते हैं कि मुझमें गुरूर आया है

@हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

आम हैं आज भी उनके जलवे पर कोई देख सकता नही है
सबकी आँखों पे पर्दा पड़ा है उनके चेहरे पे पर्दा नही है
लोग चलते हैं काँटों से बचकर मैं बचाता हूँ फूलों से दामन
इस कदर हमने खाये हैं धोखे अब किसी पर भरोसा नहीं है

अज्ञात

वफ़ा का दम जो भरते थे उन्हें भी आजमाया है
जिसे समझे थे अपना अब कहर उसने ही ढाया है

हरिशंकर पाण्डेय
‘सुमित’
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वो हमसे दूर क्या हुए अब हम बिखर गए।
आंखों में मेरे अश्क बेशुमार भर गए।।
निशाॅन ढूँढते रहे सब, ज़ख्म के मेरे।
हम अपने दर्द से ही कई बार मर गए।।

(अनिल कुमार राही)

नये शेर और ग़ज़ल की बहार

उल्फ़त…….

जिनकी उल्फ़त में इबादत की महक होती है
उनकी नफ़रत में सलीके की झलक होती है

एक शेर दुश्मनी से…..

मेरे ही कत्ल का सामान अपने साथ रखते हैं
वो जब मिलते हैं मेरे सर पे अपना हाँथ रखते हैं

एक शेर इज़हार ए प्यार ……

गुंजाइश ए इकरार हो फिर दिल निसार कर देना
उनकी नज़र को पढ़ के इजहार ए प्यार कर देना

हटा कर बदगुमानी को हमें रिश्ता निभाना है
महकते गुल खिलाकर इक नया गुलशन सजाना है

रगों की रवानी……….

मेरी ख्वाहिश का वो चमन नहीं मिला फिरभी,
मेरे ख़्वाबों के रगो में बड़ी रवानी है

हुनर है शायरी भी सीख लो मेरे यारो

दोस्तों,
शायरी सागर में आप सभी का दिल से स्वागत है। यह तो पक्की बात है कि अच्छे गीत, ग़ज़ल, कविताएं,शेर सभी लोगों को पसंद आते हैं। अच्छी शायरी भी दिल को छू लेती है।
इसीलिए मैं कहता हूँ कि शायरी सीख ही लो।

हुनर है शायरी भी सीख लो मेरे यारो
इल्म के दम से ही दिल में मुकाम बनता है

शायरी सीखना आसान है बशर्ते अगर दिल में सीखने की चाहत है।

दोस्तों, आगे बढ़ने से पहले मैं आप सभी लोगों के शायरी के प्रति प्यार और समर्पण के लिये बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ। अपने भारत वर्ष, अमेरिका,जर्मनी,पोलैंड,सिंगापुर,फिलिप्पीन, बहरैन इत्यादि मुल्क के लोग मेरे ब्लॉग से जुड़ रहे हैं यह बड़ी खुशी की बात है। आप सभी लोगों का मैं तहे दिल से शुक्र -गुजार हूँ।

दोस्तों, मेरा मानना है कि शायरी की जुबान आम जुबान होनी चाहिए। बहुत कठिन शब्दों में लिखी या सुनाई गई शायरी सिर्फ चंद लोगों के ही पल्ले पड़ती है और हमेशा आम आदमी को पसंद नहीं आती। शायरी के लफ़्ज सरल आम तौर बोले जाने वाले होने चाहिए। कई शायर उर्दू,फारसी, अरबी के बहुत कठिन शब्दों का प्रयोग करते है जिससे उनकी बात समझना सबके लिए आसान नहीं होता। शेर ऐसे होने चाहिए जिन्हे आम  लोग आसानी से समझ सके।…


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ग़म की शायरी- जो दिल को छू ले

दोस्तों, ज़िन्दगी में ख़ुशी और ग़म दोनो ही मिलते रहते हैं। मैंने कुछ शेर लिखे जो पेश ए ख़िदमत है —

मेरे गम मुझे आजमाते रहे हैं
मुझी पर मोहब्बत लुटाते रहे हैं

खुशी के बुलबुले हैं कुछ ग़मों का बोलबाला है
हँसी के हौसलों ने आज तक हमको सम्हाला है

गर्दिश ए जिंदगी में यूं बदल दिया मुझको
लोग कहते हैं कि मुझमे गरूर आया है

लफ्ज़ तलवार से भी तेज वार करते हैं
ज़ख्म दिखता ही नहीं दर्द बहुत होता है

उसने मेरा जीना ही अब दुश्वार कर दिया
ताजा था ज़ख्म फिर से वहीं वार कर दिया

हरिशंकर पाण्डेय’सुमित’

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वो हमसे दूर क्या हुए अब हम बिखर गए।
आंखों में मेरे अश्क बेशुमार भर गए।।
निशाॅन ढूँढते रहे सब, ज़ख्म के मेरे।
हम अपने दर्द से ही कई बार मर गए।।

(अनिल कुमार राही)
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पीर जब दिल से निकलकर शायरी में आएगी
एक संजीदा ग़ज़ल तहरीर में ढल जाएगी

ग़म कभी जब आजमाने ही लगे,
तुम किसी अंजाम से डरना नहीं।
जब घिरे दुख दर्द की काली घटा,
खौफ़ की उस शाम से डरना नहीं।
आएगी चौखट पे भी एक दिन खुशी,
गम के इस मेहमान से डरना नहीं

पढ़ें…

मशहूर शेर– शायर की कलम से……

बड़ी नासाज़ थी तबियत उन्होंने हाल भर पूँछा
रफ़ूचक्कर हुआ सब मर्ज़ उनके मुस्कराने से

बुलंदी मिल नहीं सकती फकत तकदीर के बल से
कड़े संघर्ष के छाले ही मंजिल से मिलाते हैं

अजब है यह नजारा जिंदगी का भी मेरे यारो
दिया है ज़ख्म जिसने अब वही मरहम लगाता है

बेज़ार हो गए थे ग़म-ए-ज़िन्दगी से हम
नज़र ए करम ने आपके जीना सिखा दिया

सुनहरे पल की खुशियों का बहुत है लौटना मुश्किल
मगर इस दिल ने अब तक आस का दामन नहीं छोड़ा

बुलंदी मिल गई हमको पर उनसे हो गई दूरी
भले जीती है बाजी आज सब कुछ खो दिया हमने

मुझे रुसवा करो बेशक़ यहाँ सारे जमाने में
मगर इल्ज़ाम तुम पर यूँ न आ जाए फ़साने में

कड़े मौसम कठिन हालात में उसको जवाँ देखा
वफ़ा वो फूल है जिसकी कभी खुशबू नहीं जाती

मेरी ख्वाहिश का वो चमन नहीं मिला फिर भी,
मेरे ख़्वाबों के रगो में बड़ी रवानी है

मोहब्बत को, इबादत की तरह जो याद रखते हैं
खुदा की रहमतों से वे सदा आबाद रहते हैं

कभी मजबूरियाँ भी रोकती हैं पेशकदमी से
मगर जो प्यार सच्चा है वो हरगिज मर नहीं सकता

हरिशंकर पाण्डेय

The Journey Begins

Thanks for joining me!

Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

post

हुनर हिम्मत हौंसला हांसिल ख़ुदी ने जब किया

रास्ते रहबर बने मंज़िल ने भी सजदा किया

कड़े मौसम कठिन हालात में उसको जवां देखा

वफ़ा वो फूल है जिसकी कभी ख़ुशबू नहीं जाती

उसे यक़ीन है फिर से बहार आएगी
चमन खिजां में कभी हौसला नहीं खोता
हरिशंकर पाण्डेय “सुमित”

भुला दो हर गिला शिकवा अगर रिश्ता निभाना है।
बहारें साथ गाएॅ॑गी जो उल्फ़त का तराना है।
ये नफरत ग़म ही देती है मिटा दो तुम इसे दिल से,
मोहब्बत के गुलो से ही हमें गुलशन सज़ाना है!

हरिशंकर पाण्डेय “सुमित”